Monday, 6 February 2012

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Thursday, 13 October 2011

सोरावुद्दीन मुठभेड़ में कांग्रेस का हाथ एकवार फिर भारतविरोधी आतंकवादियों के साथ


गुजरात में भारतविरोधी आतंकवादी सोराबुद्दीन shorabudeenसुरक्षावलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया।इस आतंकवादी के घर से एक दर्जन एक47 व दर्जनों हथगोले प्राप्त हुए। इस आतंकवादी को मारने के विरोध में कांग्रेस ने सीबीआई का दूरूपयोग करते हुए दर्जनों पुलिस अधिकारियों व जवानों को जेल में डाल दिया जो आज तक जेल में हैं। हद तो तब हो गई जब राज्य के गृहमन्त्री को भी जेल में डाल दिया गया।
मतलब यहां भी कांग्रेस का हाथ गद्दार भारतविरोधी आतंकवादियों के साथ।

MY india


RSS ने सांप्रदाय के आधार पर देश के विभाजन का डट कर विरोध किया । जब कांग्रेस ने विभाजन सवीकार कर पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दूओं को मुसलिम आतंकवादियों के हाथों मरने के लिए अकेला छोड़ दिया तब RSS ने हिन्दूओं की रक्षा के लिए दिन-रात एक कर प्रयत्न किया।
कांग्रेस ने विभाजन के दौरान RSS द्वारा हिन्दूओं की रक्षा के लिए काम करने से चिढ़ कर RSS पर प्रतिबन्ध लगा दिया 1948 में कांग्रेस नें गांधी की हत्या का झूठा आरोप लगाकर देशभक्त संगठन RSS पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
RSS ने संबैधानिक तरीके से इसका विरोध किया । बाद में मजबूर होकर कांग्रेस को मानना पड़ा कि RSS का गांधी की हत्या में कोई हाथ नहीं है। परिमामस्वारूप प्रतिबन्ध हटा लिया गया। बैसे भी कांग्रेस जानती थी कि गांधी की हत्या के लिए नैहरू ही जिम्मेदार है ।

क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है By Brijesh Patel


क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।
2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन...्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।
3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।
11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।
14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया
18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है
.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ????? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ?
२०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।
उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता। क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? 
1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया। 
2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन...्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है। 
3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी। 
4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया। 5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
 6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। 
7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया। 
8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
 9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
 10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया। 
11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
 12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
 13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया। 
14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
 15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
 16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी। 
17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया 
18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है 
.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ????? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ? २०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी। उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता। By Brijesh Patel 

महात्मा या तुष्टीकरण के जन्म दा?ता



गांधी संत या ..... ? - आपसे निवेदन है की इसे पहले पढे !! फिर बहस करे
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पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी,उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे,,गला कटे हुए.रेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे,,डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी.बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे.रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था...,," आज़ादी का तोहफा "
रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था,,दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा. ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर ,उनपर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की.भयानक बदबू......
सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं.उनके घर,उनकी खेती,पैसा-अडका, सोना-चाँदी,बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे. मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं-बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी.बलात्कार किये बिना.....? जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी.डॉक्टर ने पूछा क्यों ??? उन महिलाओं ने जवाब दिया,,हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ? हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं...उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे. " आज़ादी का तोहफा"
जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया ,उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की यात्रा (धिंड) निकाली गयी. उनको बाज़ार सजाकर बोलियाँ लगायी गयी.1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये.और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था,,उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा जी का आग्रह था...क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान को मिलना चाहिए था.विधि मंडल ने विरोध किया,,पैसा नहीं देगे....और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए.....पैसे दो,,नहीं तो मैं मर जाउगा....एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी , की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं,, दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए. दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी.इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए.निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं...जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला. गटर के किनारे रहो लेकिन छत के निचे नहीं.क्योकि,,तुम हिन्दू हो.....4000000 हिन्दू भारत में आये थे,,ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं....ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब गांधीजी माइक पर से कहते थे,,,क्यों आये यहाँ अपने घरदार बेचकर,,वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके क्यों नहीं रहे ?? यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ?
सरदार पटेल ने कहा की ठीक हैं अगर भाई को इस्टेट में से हिस्सा देना पड़ता हैं तो कर्ज की रकम का हिस्सा भी चुकाना पड़ता हैं. गंदिजी ने कहा बराबर हैं...पटेल जी ने कहा,,"फिर दुसरे महायुद्ध के समय अपने देश ने 110 करोड़ रुपये कर्ज के रूप में खड़े किये थे,अब उसका एक तृतीय भाग पाकिस्तान को देने का कहिये,,आप तो बैरिस्टर हैं आपको कायदा पता हैं. " गांधीजी ने कहा,,नहीं ये नहीं होगा
नाथुरम गोडसे
जिनकी अस्थीय अभी भी घर मे पड़ी है, जिनहोने कहा था की मेरी आस्तियां तब तक प्रवाहित नहीं करना जब तक की सिंधु नदी भारत के ध्वज के तले न बहने लगे .... क्या राष्ट्रिय से कोई इतना प्रेम कर सकता है ? क्या आपको नहीं लगता की गांधी के महात्मा से राष्ट्र का बाप बनने और एक कट्टर देश भक्त के हत्यारा बनने के पीछे कॉंग्रेस की सत्ता की लोलुपता की नीति है ? By IAC India Against Congress
see video: http://video.google.com/videoplay?docid=3003351278047805029

Tuesday, 4 October 2011

आखिर अय्यर को नेताजी का शव दिखाने तइपेई क्यों नहीं ले जाया गया ?

२० अगस्त १९४५ को जापानी कर्नल टाडा ने श्री एस. ए. अय्यर को नेताजी की मृत्यु की सूचना दी | श्री अय्यर ने आग्रह किया कि उन्हें तुरंत तइपेई पहुंचा दे | कर्नल टाडा उन्हें विमान से ले गए किन्तु तइपेई नहीं, वल्कि एक अन्य नगर ताईचू | अय्यर ने पूछा – क्या यह ताइहोकू है ? जबाब मिला- नहीं, ताइचू है | अय्यर चिल्लाये – ऐसा क्यों????? नहीं नहीं, वे मरे नहीं है, अवश्य जीवित है | यह मनगढ़ंत कहानी है | देखिये कर्नल मै साफ कहता हूँ………………. (एस. ए. अय्यर, अन्टू हिम ए विटनेस, पेज ८५-८६)

 आखिर अय्यर को नेताजी का शव दिखाने तइपेई क्यों नहीं ले जाया गया ?


क्योकि वहां विमान दुर्घटना और नेताजी के शव के नाम पर कुछ था ही नहीं |

क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं?

नेताजी की मृत्यु के संबंध में सरकार का दृष्टिकोण क्या रहा है?

मुखर्जी आयोग ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया और जाँच के पाँच प्रमुख बिन्दुओं पर 8 नवम्बर, 2005 को पेश अपनी रिपोर्ट में निम्नानुसार ठोस निष्कर्ष दिए:
(क) क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं?
मुखर्जी आयोग – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई है।

(ख) यदि उनकी मृत्यु हो चुकी है तो क्या उनकी मृत्यु जैसा कि कहा गया है हवाई दुर्घटना में हुई थी?
मुखर्जी आयोग – उनकी मृत्यु वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई, जैसा कि बताया जाता है।
(ग) क्या जापानी मंदिर में जो अस्थियाँ रखी हैं वे नेताजी की अस्थियाँ हैं?
मुखर्जी आयोग – जापानी मन्दिर में रखे अवशेष नेताजी के नहीं हैं।
(घ) क्या उनकी मृत्यु किसी अन्य स्थान पर किसी अन्य ढंग से हुई है और यदि हाँ तो कब और कैसे?
मुखर्जी आयोग – किसी निश्चित साक्ष्य के अभाव में कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया जा सकता।
(ङ) यदि वे जीवित हैं तो उनके पते-ठिकाने के संबंध में…
मुखर्जी आयोग – उत्तर (क) में पहले ही दिया जा चुका है।

लेकिन भारत सरकार संसद में प्रस्तुत अपनी कार्रवाई रिपोर्ट (ATR) में मुखर्जी आयोग के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हुई कि नेताजी की मौत 18 अगस्त, 1945 को कथित वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई थी और जापान के रेन्कोजी मंदिर में रखी अस्थियाँ नेताजी की नहीं हैं। संसद में इस बारे में हुए वाद-विवाद के दौरान गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने सरकार की तरफ से यह सफाई दी कि इस मामले पर पूर्ववर्ती शाह नवाज खान जाँच समिति तथा जी. डी. खोसला आयोग के निष्कर्षों को सरकार अधिक विश्वसनीय मानती है।
जबकि इसके ठीक विपरीत 28 अगस्त, 1978 को लोक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन दो पूर्ववर्ती जाँचों के निष्कर्षों के संबंध में निम्न वक्तव्य दिया था: – 18 अगस्त 1945 को मंचूरिया की हवाई यात्रा के दौरान तैहोकु हवाई अड्डे पर हवाई दुर्घटना में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की रिपोर्ट के बारे में दो बार जांच की गई है जिनमें से एक मेजर जनरल शाह नवाज खां की अध्यक्षता में एक समिति द्वारा की गई थी और दूसरी पंजाब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री जी.डी. खोसला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जाँच समिति द्वारा की गई थी। पहली समिति ने बहुमत से और श्री खोसला ने उनकी मृत्यु संबंधी रिपोर्ट को सच माना था। उसके बाद से इन दो रिपोर्टों में पहुंचे निष्कर्षों की सच्चाई को लेकर उचित शंकाएँ प्रस्तुत की गई हैं तथा साक्षियों की गवाही में अनेक महत्वपूर्ण असंगतियाँ देखी गई हैं |
इस संबंध में 2 फरवरी, 2007 को कोलकाता उच्च न्यायालय ने मुखर्जी आयोग के मुख्य निष्कर्षों को खारिज करने वाली केन्द्र सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट को रद्द किए जाने की मांग करते हुए दायर एक जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है।
यह प्रश्न विचारणीय है कि नेताजी की मृत्यु के संबंध में सरकार का दृष्टिकोण क्या रहा है? वर्ष 1997 में कोलकाता उच्च न्यायालय में इस मामले को अंतिम रूप से निपटाए जाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की तरफ से पेश वकील ने विगत वर्षों में सरकार के पास मौजूद गोपनीय सूचनाओं के आधार पर जो बातें अदालत को बताईं उसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अप्रैल 1998 में सरकार को इस मामले की जाँच के लिए एक नया आयोग गठित करने का आदेश दिया। अदालत के उस आदेश में सरकार के वकील के इस बयान का उल्लेख इस प्रकार किया गया है: –
“अत: अब जांच आयोग अधिनियम 1952 (1952 का 60) के खण्ड 3 के उपखंड (1) और (2) के द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केन्द्रीय सरकार एतद्द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एम.के. मुखर्जी सहित एक जांच आयोग का गठन करती है।”
इस अधिसूचना से साफ जाहिर है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के बारे में कोई असंदिग्ध जानकारी नहीं थी और इसीलिए उसका यह मत था कि आयोग का गठन किया जाना जरूरी था, जिसके लिए कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रभाशंकर मिश्रा ने आदेश दिया था। उक्त अधिसूचना में उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित नए आयोग को जाँच के लिए दिए गए प्रश्नों से भी यह साफ जाहिर होता है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के संबंध में कोई निश्चयात्मक सूचना नहीं थी। यदि उसके पास ऐसी ठोस सूचना रही होती तो उसने आयोग द्वारा जाँच किए जाने हेतु इस तरह के प्रश्न तैयार नहीं किए होते |