Thursday, 13 October 2011

सोरावुद्दीन मुठभेड़ में कांग्रेस का हाथ एकवार फिर भारतविरोधी आतंकवादियों के साथ


गुजरात में भारतविरोधी आतंकवादी सोराबुद्दीन shorabudeenसुरक्षावलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया।इस आतंकवादी के घर से एक दर्जन एक47 व दर्जनों हथगोले प्राप्त हुए। इस आतंकवादी को मारने के विरोध में कांग्रेस ने सीबीआई का दूरूपयोग करते हुए दर्जनों पुलिस अधिकारियों व जवानों को जेल में डाल दिया जो आज तक जेल में हैं। हद तो तब हो गई जब राज्य के गृहमन्त्री को भी जेल में डाल दिया गया।
मतलब यहां भी कांग्रेस का हाथ गद्दार भारतविरोधी आतंकवादियों के साथ।

MY india


RSS ने सांप्रदाय के आधार पर देश के विभाजन का डट कर विरोध किया । जब कांग्रेस ने विभाजन सवीकार कर पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दूओं को मुसलिम आतंकवादियों के हाथों मरने के लिए अकेला छोड़ दिया तब RSS ने हिन्दूओं की रक्षा के लिए दिन-रात एक कर प्रयत्न किया।
कांग्रेस ने विभाजन के दौरान RSS द्वारा हिन्दूओं की रक्षा के लिए काम करने से चिढ़ कर RSS पर प्रतिबन्ध लगा दिया 1948 में कांग्रेस नें गांधी की हत्या का झूठा आरोप लगाकर देशभक्त संगठन RSS पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
RSS ने संबैधानिक तरीके से इसका विरोध किया । बाद में मजबूर होकर कांग्रेस को मानना पड़ा कि RSS का गांधी की हत्या में कोई हाथ नहीं है। परिमामस्वारूप प्रतिबन्ध हटा लिया गया। बैसे भी कांग्रेस जानती थी कि गांधी की हत्या के लिए नैहरू ही जिम्मेदार है ।

क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है By Brijesh Patel


क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?
1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।
2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन...्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।
3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।
11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।
14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया
18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है
.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ????? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ?
२०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।
उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता। क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ? 
1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया। 
2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन...्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है। 
3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी। 
4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया। 5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
 6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। 
7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया। 
8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
 9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
 10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया। 
11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
 12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
 13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया। 
14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
 15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
 16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी। 
17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया 
18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है 
.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ????? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ? २०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी। उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता। By Brijesh Patel 

महात्मा या तुष्टीकरण के जन्म दा?ता



गांधी संत या ..... ? - आपसे निवेदन है की इसे पहले पढे !! फिर बहस करे
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पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी,उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे,,गला कटे हुए.रेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे,,डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी.बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे.रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था...,," आज़ादी का तोहफा "
रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था,,दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा. ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर ,उनपर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की.भयानक बदबू......
सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं.उनके घर,उनकी खेती,पैसा-अडका, सोना-चाँदी,बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे. मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं-बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी.बलात्कार किये बिना.....? जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी.डॉक्टर ने पूछा क्यों ??? उन महिलाओं ने जवाब दिया,,हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ? हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं...उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे. " आज़ादी का तोहफा"
जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया ,उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की यात्रा (धिंड) निकाली गयी. उनको बाज़ार सजाकर बोलियाँ लगायी गयी.1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये.और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था,,उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा जी का आग्रह था...क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान को मिलना चाहिए था.विधि मंडल ने विरोध किया,,पैसा नहीं देगे....और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए.....पैसे दो,,नहीं तो मैं मर जाउगा....एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी , की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं,, दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए. दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी.इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए.निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं...जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला. गटर के किनारे रहो लेकिन छत के निचे नहीं.क्योकि,,तुम हिन्दू हो.....4000000 हिन्दू भारत में आये थे,,ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं....ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब गांधीजी माइक पर से कहते थे,,,क्यों आये यहाँ अपने घरदार बेचकर,,वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके क्यों नहीं रहे ?? यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ?
सरदार पटेल ने कहा की ठीक हैं अगर भाई को इस्टेट में से हिस्सा देना पड़ता हैं तो कर्ज की रकम का हिस्सा भी चुकाना पड़ता हैं. गंदिजी ने कहा बराबर हैं...पटेल जी ने कहा,,"फिर दुसरे महायुद्ध के समय अपने देश ने 110 करोड़ रुपये कर्ज के रूप में खड़े किये थे,अब उसका एक तृतीय भाग पाकिस्तान को देने का कहिये,,आप तो बैरिस्टर हैं आपको कायदा पता हैं. " गांधीजी ने कहा,,नहीं ये नहीं होगा
नाथुरम गोडसे
जिनकी अस्थीय अभी भी घर मे पड़ी है, जिनहोने कहा था की मेरी आस्तियां तब तक प्रवाहित नहीं करना जब तक की सिंधु नदी भारत के ध्वज के तले न बहने लगे .... क्या राष्ट्रिय से कोई इतना प्रेम कर सकता है ? क्या आपको नहीं लगता की गांधी के महात्मा से राष्ट्र का बाप बनने और एक कट्टर देश भक्त के हत्यारा बनने के पीछे कॉंग्रेस की सत्ता की लोलुपता की नीति है ? By IAC India Against Congress
see video: http://video.google.com/videoplay?docid=3003351278047805029

Tuesday, 4 October 2011

आखिर अय्यर को नेताजी का शव दिखाने तइपेई क्यों नहीं ले जाया गया ?

२० अगस्त १९४५ को जापानी कर्नल टाडा ने श्री एस. ए. अय्यर को नेताजी की मृत्यु की सूचना दी | श्री अय्यर ने आग्रह किया कि उन्हें तुरंत तइपेई पहुंचा दे | कर्नल टाडा उन्हें विमान से ले गए किन्तु तइपेई नहीं, वल्कि एक अन्य नगर ताईचू | अय्यर ने पूछा – क्या यह ताइहोकू है ? जबाब मिला- नहीं, ताइचू है | अय्यर चिल्लाये – ऐसा क्यों????? नहीं नहीं, वे मरे नहीं है, अवश्य जीवित है | यह मनगढ़ंत कहानी है | देखिये कर्नल मै साफ कहता हूँ………………. (एस. ए. अय्यर, अन्टू हिम ए विटनेस, पेज ८५-८६)

 आखिर अय्यर को नेताजी का शव दिखाने तइपेई क्यों नहीं ले जाया गया ?


क्योकि वहां विमान दुर्घटना और नेताजी के शव के नाम पर कुछ था ही नहीं |

क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं?

नेताजी की मृत्यु के संबंध में सरकार का दृष्टिकोण क्या रहा है?

मुखर्जी आयोग ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया और जाँच के पाँच प्रमुख बिन्दुओं पर 8 नवम्बर, 2005 को पेश अपनी रिपोर्ट में निम्नानुसार ठोस निष्कर्ष दिए:
(क) क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं?
मुखर्जी आयोग – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई है।

(ख) यदि उनकी मृत्यु हो चुकी है तो क्या उनकी मृत्यु जैसा कि कहा गया है हवाई दुर्घटना में हुई थी?
मुखर्जी आयोग – उनकी मृत्यु वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई, जैसा कि बताया जाता है।
(ग) क्या जापानी मंदिर में जो अस्थियाँ रखी हैं वे नेताजी की अस्थियाँ हैं?
मुखर्जी आयोग – जापानी मन्दिर में रखे अवशेष नेताजी के नहीं हैं।
(घ) क्या उनकी मृत्यु किसी अन्य स्थान पर किसी अन्य ढंग से हुई है और यदि हाँ तो कब और कैसे?
मुखर्जी आयोग – किसी निश्चित साक्ष्य के अभाव में कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया जा सकता।
(ङ) यदि वे जीवित हैं तो उनके पते-ठिकाने के संबंध में…
मुखर्जी आयोग – उत्तर (क) में पहले ही दिया जा चुका है।

लेकिन भारत सरकार संसद में प्रस्तुत अपनी कार्रवाई रिपोर्ट (ATR) में मुखर्जी आयोग के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हुई कि नेताजी की मौत 18 अगस्त, 1945 को कथित वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई थी और जापान के रेन्कोजी मंदिर में रखी अस्थियाँ नेताजी की नहीं हैं। संसद में इस बारे में हुए वाद-विवाद के दौरान गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने सरकार की तरफ से यह सफाई दी कि इस मामले पर पूर्ववर्ती शाह नवाज खान जाँच समिति तथा जी. डी. खोसला आयोग के निष्कर्षों को सरकार अधिक विश्वसनीय मानती है।
जबकि इसके ठीक विपरीत 28 अगस्त, 1978 को लोक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन दो पूर्ववर्ती जाँचों के निष्कर्षों के संबंध में निम्न वक्तव्य दिया था: – 18 अगस्त 1945 को मंचूरिया की हवाई यात्रा के दौरान तैहोकु हवाई अड्डे पर हवाई दुर्घटना में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की रिपोर्ट के बारे में दो बार जांच की गई है जिनमें से एक मेजर जनरल शाह नवाज खां की अध्यक्षता में एक समिति द्वारा की गई थी और दूसरी पंजाब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री जी.डी. खोसला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जाँच समिति द्वारा की गई थी। पहली समिति ने बहुमत से और श्री खोसला ने उनकी मृत्यु संबंधी रिपोर्ट को सच माना था। उसके बाद से इन दो रिपोर्टों में पहुंचे निष्कर्षों की सच्चाई को लेकर उचित शंकाएँ प्रस्तुत की गई हैं तथा साक्षियों की गवाही में अनेक महत्वपूर्ण असंगतियाँ देखी गई हैं |
इस संबंध में 2 फरवरी, 2007 को कोलकाता उच्च न्यायालय ने मुखर्जी आयोग के मुख्य निष्कर्षों को खारिज करने वाली केन्द्र सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट को रद्द किए जाने की मांग करते हुए दायर एक जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है।
यह प्रश्न विचारणीय है कि नेताजी की मृत्यु के संबंध में सरकार का दृष्टिकोण क्या रहा है? वर्ष 1997 में कोलकाता उच्च न्यायालय में इस मामले को अंतिम रूप से निपटाए जाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की तरफ से पेश वकील ने विगत वर्षों में सरकार के पास मौजूद गोपनीय सूचनाओं के आधार पर जो बातें अदालत को बताईं उसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अप्रैल 1998 में सरकार को इस मामले की जाँच के लिए एक नया आयोग गठित करने का आदेश दिया। अदालत के उस आदेश में सरकार के वकील के इस बयान का उल्लेख इस प्रकार किया गया है: –
“अत: अब जांच आयोग अधिनियम 1952 (1952 का 60) के खण्ड 3 के उपखंड (1) और (2) के द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केन्द्रीय सरकार एतद्द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एम.के. मुखर्जी सहित एक जांच आयोग का गठन करती है।”
इस अधिसूचना से साफ जाहिर है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के बारे में कोई असंदिग्ध जानकारी नहीं थी और इसीलिए उसका यह मत था कि आयोग का गठन किया जाना जरूरी था, जिसके लिए कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रभाशंकर मिश्रा ने आदेश दिया था। उक्त अधिसूचना में उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित नए आयोग को जाँच के लिए दिए गए प्रश्नों से भी यह साफ जाहिर होता है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के संबंध में कोई निश्चयात्मक सूचना नहीं थी। यदि उसके पास ऐसी ठोस सूचना रही होती तो उसने आयोग द्वारा जाँच किए जाने हेतु इस तरह के प्रश्न तैयार नहीं किए होते |

क्या नेताजी ने ‘भगवान जी’ उर्फ ‘गुमनामी बाबा’ का रूप धारण किया था?

रचलित कहानी के अनुसार, 1950 के दशक में ‘दशनामी’ सम्प्रदाय के एक सन्यासी नेपाल के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं। नीमशहर और बस्ती में वे अपना एकाकी जीवन बिताते हैं। उन्हें ‘भगवानजी’ के नाम से जाना जाता है।
बताया जाता है कि नेताजी को पहले से जानने वाले कुछ लोग- जैसे उनके कुछ रिश्तेदार, कुछ शुभचिन्तक, कुछ स्वतंत्रता सेनानी, कुछ आजाद हिन्द फौज के अधिकारी उनसे गुप-चुप रूप से मिलते रहते थे। खासकर, 23 जनवरी और दुर्गापूजा के दिन मिलने-जुलने वालों की तादाद बढ़ जाती थी। पहचान खुलने के भय से और कुछ अर्थाभाव के कारण 1983 में, 86 वर्ष की अवस्था में वे पुरानी जगह बदल देते हैं और फैजाबाद (अयोध्या) आ जाते हैं। (ध्यान रहे, नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था।)
1975 से ही उनके भक्त बने डॉ. आर.पी. मिश्रा ‘रामभवन’ में उनके लिए दो कमरे किराये पर लेते हैं। यहाँ भगवानजी एकान्त में रहते हैं, पर्दे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते हैं और रात के अन्धेरे में ही उन्हें जानने वाले उनसे मिलने आते हैं। यहाँ तक कि उनके मकान-मालिक गुरुबसन्त सिंह भी दो वर्षों में सामने से उनका चेहरा नहीं देख पाते हैं। उनकी देखभाल के लिए सरस्वती देवी अपने बेटे राजकुमार मिश्रा के साथ रहती हैं। भगवानजी इतने गोपनीय ढंग से रहते हैं कि उन्हें ‘गुमनामी बाबा’ का नाम मिल जाता है, जो गुमनाम ही रहना चाहता हो।
16 सितम्बर 1985 को गुमनामी बाबा का देहान्त होता है। 18 सितम्बर को उनके भक्तजन बाकायदे तिरंगे में लपेटकर उनका पार्थिव शरीर सरयू तट के गुप्तार घाट पर ले जाते हैं और तेरह लोगों की उपस्थिति में उनका अन्तिम संस्कार कर दिया जाता है। इसके बाद खबर जोर पकड़ती है कि है कि गुमनामी बाबा नेताजी थे।
गुमनामी बाबा के सामान को प्रशासन नीलाम करने जा रहा था। लालिता बोस, एम.ए. हलीम और विश्वबन्धु तिवारी कोर्ट गये, तब जाकर अदालत के आदेश पर मार्च’ 86 से सितम्बर’ 87 के बीच उनके सामान को 24 ट्रंकों में सील किया गया। 26 नवम्बर 2001 को इन ट्रंकों के सील मुखर्जी आयोग के सामने खोले जाते हैं और इनमें बन्द 2,600 से भी अधिक चीजों की जाँच की जाती है। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के अलावे इन चीजों में नामी-गिरामी लोगों- जैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के “गुरूजी”, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल के पत्र, नेताजी से जुड़े समाचारों-लेखों के कतरन, रोलेक्स और ओमेगा की दो कलाई-घड़ियाँ (कहते हैं कि ऐसी ही घड़ियाँ वे पहनते थे), जर्मन दूरबीन, इंगलिश टाईपराइटर, पारिवारिक छायाचित्र, हाथी दाँत का स्मोकिंग पाईप (टूटा हुआ) इत्यादी हैं। यहाँ तक कि नेताजी के बड़े भाई सुरेश बोस को खोसला आयोग द्वारा भेजे गये सम्मन की मूल प्रति भी है।
श्री मनोज कुमार मुखर्जी चूँकि ‘न्यायाधीश’ (अवकाशप्राप्त) हैं, अतः ‘बिना पक्के सबूतों और गवाहों’ के वे अन्तिम निर्णय लेने में असमर्थ हैं। तीन कारणों से वे ‘गुमनामी बाबा’ को ‘नेताजी’ घोषित नहीं करते:
1. बाबा को करीब से जानने वाले लोग स्वर्गवासी हो चुके हैं, अतः वे गवाही के लिए उपलब्ध नहीं हो सकते;
2. बाबा का कोई छायाचित्र उपलब्ध नहीं है, और
3. सरकारी फोरेंसिक लैब ने उनके ‘हस्तलेख’ और ‘दाँतों’ की डी.एन.ए. जाँच का रिपोर्ट ऋणात्मक दिया है।
(ये दाँत एक माचिस की डिबिया में रखे पाये गये थे। अच्छा होता, अगर जस्टिस मुखर्जी ने ये जाँच भारत के बाहर के फोरेंसिक लैबों में भी करवाये होते। भारतीय ‘सरकारी’ लैबों की रिपोर्टों को विश्वसनीय मानना जरा मुश्किल है |)
खैर, नेताजी के ज्यादातर भक्त आज ‘दशनामी सन्यासी’ उर्फ ‘भगवान जी’ उर्फ ‘गुमनामी बाबा’ को ही नेताजी मानते हैं। (अनुज धर के ‘मिशन नेताजी’ ने इसके लिए बाकायदे अभियान चला रखा है।) कारण हैं: उनकी कद-काठी, बोल-चाल इत्यादि नेताजी जैसा होना; कम-से-कम चार मौकों पर उनका यह स्वीकारना कि वे नेताजी हैं; उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना; नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता और पत्र-व्यवहार; बात-चीत में उनका जर्मनी आदि देशों का जिक्र करना; इत्यादि।
जो बातें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के समर्थन में जाती हैं, उन्हीं में से कुछ बातें उनके विरुद्ध भी जाती है, मिसाल के तौर पर: सन्यास लेकर जब नेताजी ने पिछले जीवन से नाता तोड़ लिया, तो फिर पुराने पारिवारिक छायाचित्रों के मोह से वे क्यों बँधे रहे? क्या सिंगापुर छोड़ने के समय से ही वे इन छायाचित्रों को साथ लिये घूम रहे थे?
अगर उनके सामान में उनके ही टाईपराईटर और बायनोकूलर पाये जाते हैं, तो यह ‘दाल में काला’- जैसा मामला है। सिंगापुर छोड़ते समय निस्सन्देह वे अपना टाईपराइटर और बायनोकूलर साथ नहीं ले गये होंगे, न ही (सन्यास धारण करने के बाद) सोवियत संघ से भारत आते समय इन्हें लेकर आये होंगे, फिर ये उनतक कैसे पहुँचे? सिंगापुर में उनके सामान को तो माउण्टबेटन की सेना ने जब्त कर सरकारी खजाने में पहुँचा दिया होगा। (एक कुर्सी शायद लालकिले में है।)
माना कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नेताजी पर छपने वाली खबरों की कतरनों को उनके भक्तजनों ने उनतक पहुँचाया होगा, मगर सरकारी खजाने से निकालकर मेड इन इंग्लैण्ड एम्पायर कोरोना टाईपराइटर और मेड इन जर्मनी 16 गुना 56 दूरबीन उनतक पहुँचाना उनके भक्तजनों के बस की बात नहीं है। तो फिर? क्या गुप्तचर विभाग के अधिकारियों ने उनके पास ये सामान पहुँचाये? तो क्या ‘गुमनामी बाबा’ को भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने खड़ा किया था? ताकि वास्तविक नेताजी की ओर लोगों का ध्यान न जाये? या फिर, जनता ‘ये असली हैं’ और ‘वे असली हैं’ को लेकर लड़ती रहे और सरकार चैन की साँस लेती रहे?

आजाद हिन्द फौज , photo


नेताजी – जिन्दा या मुर्दा १९. प्रश्न ८. १९६१ में पश्चिम बंगाल के जिला कूच बिहार के शौल्मारी आश्रम के स्वामी शारदानंद नेताजी नहीं तो कौन थे ?

सन १९६० में पश्चिम बंगाल के जिला कूच बिहार में एक आश्रम की स्थापना हुई – शौल्मारी आश्रम | इस आश्रम के स्वामी थे- स्वामी शारदानंद |
29 सितम्बर 1961 को एक शिक्षक श्री राधेश्याम जायसवाल पत्र लिखकर नेहरूजी को सूचित करते हैं कि सिलहट के पास शौलमारी आश्रम के साधू की गतिविधियाँ सन्देहास्पद हैं। वे चैन-स्मोकर हैं, आयातित सिगरेट पीते हैं; रूसी, चीनी, जर्मन इत्यादि भाषाओं के जानकार हैं; और उनके आश्रम के आस-पास ऐसी अफवाह है कि वे नेताजी हैं। श्री जायसवाल को सन्देह था कि आश्रम में कोई विदेशी षड्यंत्र चल रहा है। (चैन-स्मोकर अर्थात लगातार सिगरेट पीने वाले। नेताजी भी ऐसे सिगरेट का शौक रखते थे, यह उनके एक छायाचित्र से पता चलता है।)
आश्रम के साधू हैं- स्वामी शारदानन्द। (नेताजी के लालन-पालन में माँ के अलावे जिन महिला का हाथ रहा है, उनका नाम ‘शारदा’ था।) साल-डेढ़ साल पहले कूच बिहार जिले (पश्चिम बंगाल) के फालाकाटा में उन्होंने शौलमारी आश्रम की स्थापना की है। गुप्तचर विभाग वाले आश्रम की गतिविधियों की जाँच करते हैं और अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि वहाँ कुछ गलत नहीं है। दिल्ली के ‘वीर अर्जुन’ दैनिक में खबर छपती है। इन स्वामी जी के बारे में पुरे भारत भर में हल्ला मचता है कि उक्त स्वामी जी नेताजी ही हैं |नेताजी के भक्त और आजाद हिन्द फौज वाले आश्रम पहुँचने लगते हैं। फौजी जब बाहर आते हैं, तब उनके होंठ सिले होते हैं। सिर्फ एक मेजर सत्यप्रकाश गुप्ता १९६१ में आश्रम जाते हैं और कोलकाता में (फरवरी’ 62 में) प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर घोषणा करते हैं कि शारदानन्द नेताजी हैं। (१९३९ में त्रिपुरी अधिवेशन के समय जबकि कांग्रेसी पिठू नेतागण नेताजी के बीमारी को एक राजनितिक स्टंट बता रहे थे, मेजर सत्यप्रकाश गुप्ता दिनरात नेताजी की सेवा में लगे थे | ये आजाद हिंद फौज में होमफ्रंट के इंचार्ज थे | ) मेजर ने वक्तव्य दिया – There is no mistake in identifying my master and there is no doubt that Shoulmari sadhuji is Netaji . Existance of the Sun and the man may be questioned but my meeting with Netajee is beyond all doubts. ( Netaji is coming, Page 15, Samiran ghosh)
इस बीच श्री उत्तम चन्द मल्होत्रा को भी 30-31 जुलाई 1962 को शारदानन्द से मिलने की अनुमति मिलती है और मिलने के बाद वे दावा करते हैं कि उन्होंने पहचान लिया है- आश्रम के सन्यासी ‘शारदानन्द’ और कोई नहीं, बल्कि नेताजी हैं! उत्तम चन्द मल्होत्रा वे व्यक्ति हैं, जिनके साथ एक ही कमरे में नेताजी ने 46 दिन बिताये थे- काबुल में, जब वे (नेताजी) “जियाउद्दीन” का भेष धारण कर यूरोप जाने का प्रयास कर रहे थे और दूसरी तरफ ब्रिटिश जासूस उनकी जान के पीछे पड़े थे।
27 मई 1964 के दिन स्वामी शारदानन्द नेहरूजी की अन्तिम यात्रा में शामिल होने दिल्ली आते हैं। नेहरूजी के पार्थिव शरीर के पास खड़े मुद्रा में उनकी तस्वीर मुम्बई से प्रकाशित होने वाले दमदार साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ में छप जाती है। (क्या आपको नहीं लगता कि बंगाल का एक साधारण सन्यासी भला नेहरूजी का अन्तिम दर्शन क्यों करना चाहेगा? जरूर वह सन्यासी कुछ असाधारण है।) तस्वीर छपने के बाद से स्वामी शारदानन्द को आठ महीनों के लिए ‘अज्ञात’ होना पड़ता है। (क्या गुप्तचर विभाग के निर्देश से?) इसके बाद भी लगभग आठ वर्षों तक वे देशाटन पर ही रहते हैं और प्रकाश में नहीं आते।
जनमानस उस तस्वीर को भूलने लगता है।
1972 में उन्हें सरकार देहरादून और मसूरी के बीच राजपुरा में एक कोठी (नं-194) और जमीन (कहते हैं कि 100 एकड़) मुहैया कराती है। उनकी उम्र 76 वर्ष हो चली है, भटकने की उम्र अब नहीं रही। सरकार (देखा जाय तो गुप्तचर विभाग; गुप्तचर विभाग का एक अधिकारी उनके साथ ही है।) भी महसूस करती है कि अब वे ज्यादा नहीं जीयेंगे। अब वे सफेद दाढ़ी रखने लगे हैं। (क्या यह भी गुप्तचर विभाग का निर्देश है?) उन्हें कोठी श्रीमती नयनतारा सहगल की कोठी के पास दिया जाता है। नयनतारा सहगल बेटी हैं श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित की। स्वामी जी को कोठी दिलाने में जरूर उन्होंने ही मदद की है। आप सोचेंगे क्यों? क्योंकि नेताजी की बेटी अनिता बोस जब 18 वर्ष की उम्र में पहली बार भारत आयी थी (1960 में), तब दिल्ली में 5 दिनों के लिए श्रीमती नयनतारा सहगल ने ही उन्हें अपने घर में रखा था अर्थात् नेताजी के साथ उनका एक तरह से पारिवारिक रिश्ता पहले से ही है। यहाँ स्वामी जी शान्ति से अपना जीवन गुजारते हैं। लोगों से उनकी बात-चीत नहीं के बराबर है। उनके पास कोई सामान नहीं है। फर्नीचर के नाम पर सिर्फ एक कुर्सी है।
श्री अजमेर सिंह रन्धावा के एक संस्मरण का जिक्र करना यहाँ प्रासंगिक होगा। स्वामी जी को जब कहीं जाना होता था, तब श्री रन्धावा की कार बुलाई जाती थी। स्वामी जी का एक परिचारक एक बाल्टी पानी में कटे हुए नीम्बू डालकर लाता था और उस पानी से कार की अन्दर बाहर सफाई करता था। तब रन्धावा जी हँसा करते थे- कि यह क्या टोटका है। स्वामी जी की मृत्यु के बाद जब उन्हें उनकी पहचान बतायी गयी, तब उनका ध्यान गया कि ऐसा इसलिए किया जाता था, ताकि बाद में कोई स्वामी जी का “फिंगर प्रिण्ट” न ले सके! (फिंगर प्रिण्ट लेने से पहले जो पाउडर छिड़का जाता है, उसके साथ नीम्बू का अम्ल प्रतिक्रिया करता है और उँगलियों की छाप को उभरने नहीं देता।)
(श्री रन्धावा आज 60 वर्ष के हैं और जिज्ञासुओं के प्रश्न का उत्तर देने के लिए सहर्ष तैयार हैं। वे स्वामी शारदानन्द के अन्तिम-संस्कार के प्रत्यक्षदर्शी हैं। उनका फोन नम्बर है: 9811857449।)




कहा जाता है कि स्वामी शारदानन्द ने 110 दिनों की समाधि ली थी। 93वें दिन उनके गर्दन के पीछे रक्त की एक बूँद शरीर से बाहर आती है और इस प्रकार, 13 अप्रैल 1977 को वे देह त्यागते हैं। उनके सचिव के माध्यम से सूचना दिल्ली सरकार को मिलती है और दिल्ली से लखनऊ को आदेश मिलता है कि उस सन्त का अन्तिम संस्कार पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया जाय!
क्या आपने किसी और साधू-सन्त के बारे में ऐसा सुना है कि पुलिस-प्रशासन ने उनका अन्तिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया हो? मगर स्वामी शारदानन्द के साथ ऐसा होता है। पूरे 10 दिनों तक उनके पार्थिव शरीर को जनता के दर्शनों के लिए रखा जाता है। उसके बाद तिरंगे में लपेट कर तीन ट्रक पुलिस वालों के संरक्षण में उनके शव को ऋषिकेष ले जाया जाता है। 21 बन्दूकों की सलामी और ‘शोक शस्त्र’ के साथ उनकी चिता को अग्नि दी जाती है। छायाकारी का अधिकार सिर्फ पुलिस के छायाकार श्री एस. जोगी को था। अतः कहा जा सकता है कि एक सन्यासी के राजकीय सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार के सबूत अब भी सरकारी दराजों में मौजूद हैं।
स्वामी शारदानन्द के अस्थिभस्म को गंगाजी में प्रवाहित करते हुए उनके सचिव डॉ. रमनी रंजन दास ने “नेताजी” कहकर उन्हें अन्तिम श्रद्धाँजली दी। पीछे खड़े पुलिस अधिकारी इन्दरपाल सिंह चौंक पड़े, “अब तक तो आप यही कहते आ रहे थे कि ये साधू नेताजी नहीं हैं!” डॉ. दास शुरू से ही (1959-60 से, या हो सकता है 1955 से, जब से नेताजी ने सोवियत संघ से भारत में प्रवेश किया था) स्वामी शारदानन्द के सचिव थे। हो सकता है कि वे ही भारतीय गुप्तचर सेवा के अधिकारी रहे हों।
मैं तो अपनी ओर से भारतीय गुप्तचर सेवा को सलामी दूँगा। आज जबकि कोई भी सरकारी विभाग कायदे से काम नहीं करता, ऐसे में भारतीय गुप्तचर सेवा सरकार के आदेश पर अपने ही देशवासियों को धोखे में रखने में शत-प्रतिशत सफल रही

Monday, 3 October 2011

नेताजी के सपने को पूरा करना है...









हते हैं कि सूर्योदय से पहले का अन्धेरा कुछ ज्यादा ही घना होता है। एक घोटालेबाज देश के रुप में बदनाम हो रहा हमारा देश शायद उसी अन्धेरे के दौर से गुजर रहा है।
गुलामी का दौर भी अन्धेरे का ही दौर था। उस वक्त नेताजी किस प्रकार के शासन के बारे में सोचते थे यह उनके निम्न कथन से जाहिर होता है:
ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बाद इस भारत में पहले बीस वर्ष के लिये तानाशाही राज्य कायम होनी चाहिये एक तानाशाही ही देश से गद्दारों को निकाल सकता है
भारत को अपनी समस्याओं के समाधान के लिये एक कमाल पाशा की आवश्यकता है
(उल्लेखनीय है कि नेताजी ‘कमाल अतातुर्क पाशा’ को अपना आदर्श मानते थे, जिनकी तानाशाही की बदौलत तुर्की के लोग आज अपने देश को दकियानूस अरब जगत का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक यूरोपीय देशों के समकक्ष मानते हैं।)
नेताजी ने ये बातें भले आजादी से बहुत पहले कही थीं, मगर आजादी के 64 वर्षों के बाद आज इन कथनों की सार्थकता अचानक बढ़ गयी है।
नेताजी के कथन में जिन्हें ‘गद्दार’ कहा गया हैं, आज भी वे हमारे बीच भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट उच्चाधिकारी, भ्रष्ट पूँजीपति और माफिया सरगना के रुप में मौजूद हैं- इसमें कोई दो राय नहीं है
समय आ गया है कि नेताजी- जैसा कोई व्यक्ति देश की सत्ता सम्भाले, गद्दारों को (व्यवस्था से) निकाल बाहर करे, देश की समस्याओं का समाधान करते हुए आदर्श ‘लोक’-तंत्र या ‘जन’-तंत्र की स्थापना करे और विश्व के मानचित्र पर देश को वह स्थान दिलाये, जिसका वह हकदार है
अगर यह सब कुछ कुछ वर्षों के ‘एकच्छत्रीय’ लोकतंत्र (राष्ट्रपति प्रणाली- जैसी) से भी आता है, तो हर्ज क्या है?
वयोवृद्ध अर्थशास्त्री डॉ. अरूण घोष के इस कथन पर नजर डालिये, जिससे पता चलता है कि आज हमारा ‘संसदीय’ लोकतंत्र (अब तो गठबन्धन अनिवार्य हो चला है) कोई बहुत अच्छे ढंग से काम नहीं कर रहा है:   
मैं तो केवल सर्वनाश देख सकता हूँ भविष्य में क्या होगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता पर समाज विचलित हो रहा है जनता की नाराजगी बढ़ रही है मेरा मानना है कि संसद वर्तमान स्थिति को रोकने की हालत में नहीं है सभी पार्टियाँ इन नीतियों (उदारीकरण) की समर्थक हैं, और सांसदों में सड़क पर आने का दम नहीं है
मुझे तो लगता है कि एक लाख लोग अगर संसद को घेर लें, तो शायद कुछ हो
       डॉ. अरूण घोष ने ये बातें दैनिक 'जनसत्ता' को दिये गये अपने साक्षात्कार में कही थी। यह साक्षात्कार 30 जुलाई 1998 को प्रकाशित हुआ था।
***
       अन्त में, गाँधीजी के विचारों को पढ़ा जाय, जिसे पढ़कर ऐसा लगेगा, मानो सात-आठ दशकों पहले ही उनकी अन्तर्दृष्टि ने हमारे आज के ‘संसदीय लोकतंत्र’ को देख लिया था:
       ऐसा सामान्यतया माना जाता है कि संसद-सदस्य पाखण्डी एवं स्वार्थी होते हैं। सभी अपने छोटे-छोटे हितों की सोचते हैं। सदस्य बिना सोचे ही अपनी पार्टी को संसद में वोट देते हैं। तथाकथित अनुशासन ही उन्हें बाँधे रखता है। अपवाद स्वरुप अगर कोई संसद-सदस्य स्वतंत्र वोट करता है, तो उसे विश्वासघाती मान लिया जाता है।
      प्रधानमंत्री संसद के कल्याण से ज्यादा अपनी शक्ति के लिए चिन्तित रहता है। उसकी ऊर्जा पार्टी की सफलता प्राप्त कराने में ही लगी रहती है। उसे यह चिन्ता नहीं रहती है कि संसद को सही काम करना चाहिए।
      अगर वे (प्रधानमंत्री) ईमानदार माने जाते हैं, तो इसलिए क्योंकि वे वह नहीं लेते, जिसे सामान्यतया घूस माना जाता है। लेकिन कुछ दूसरी प्रभावी विधियाँ भी हैं। वे अपने हितों को साधने के लिए लोगों को पुरस्कार एवं सम्मान के रूप में घूस देते हैं। मैं यह कहने को मजबूर हूँ कि वे न तो सच्चे ईमानदार हैं और न ही उनकी अन्तरात्मा जीवित है।
       (यह कथन ‘इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय’- ‘इग्नू’- की पाठ्य-पुस्तक आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारधारा के खण्ड- 3 (EPS- 3), पृष्ठ- 10 से उद्धृत है। नेताजी का कथन भी इसी पुस्तक से लिया गया है।)

“नेताजी से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करे सरकार


सूचना के अधिकार के तहत नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग ने पिछले एक सप्ताह में भारत सरकार को दूसरा बड़ा झटका दिया है। पिछले सप्ताह 26 मार्च, 2007 को इस मामले में मिशन नेताजी के शयन्तन दासगुप्ता की अपील पर सुनवाई के दौरान केन्द्रीय सूचना आयोग के सूचना आयुक्त ए.एन. तिवारी ने कहा कि “नेताजी से जुड़े दस्तावेजों पर से गोपनीयता का परदा हटाना होगा।” उन्होंने कहा कि “भारतीयों को अपने राष्ट्रनायक के बारे में सभी सूचना हासिल करने का पूरा अधिकार है।” उन्होंने घोषणा की कि इस मामले में अगली सुनवाई केन्द्रीय सूचना आयोग की पूर्ण पीठ करेगी और गृह मंत्रालय के पास इस मामले में आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने का यह अंतिम अवसर होगा और मंत्रालय को इस बारे में पर्याप्त स्पष्टीकरण देना होगा कि उन दस्तावेजों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि “यदि सरकार का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं हुआ तो आयोग सभी संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने का आदेश देने के लिए बाध्य होगा।”
मामले पर सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय के अधिकारी आयोग द्वारा निर्दिष्ट आवश्यक दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के बजाय गृह सचिव द्वारा लिखित एक गोपनीय नोट लेकर आए, जिसमें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क) का राग अलापा गया था। इस नोट को देखकर सूचना आयुक्त ए.एन. तिवारी भड़क गए और उन्होंने टिप्पणी की:
The issue is far too important to be decided in an ad hoc manner at the level of a Home Secretary. I am not prepared to allow an omnibus recourse to section 8 (1) (a)….
(यह मामला इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस पर गृह सचिव के स्तर पर तदर्थ तरीके से निर्णय नहीं लिया जा सकता। मैं धारा 8(1)(क) का हर जगह सहारा लिए जाने की अनुमति देने के लिए तैयार नहीं हूं….)
गौरतलब है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में लापता हो जाने की जाँच के लिए मुखर्जी आयोग से पहले भारत सरकार द्वारा गठित दो अन्य जाँच पैनलों ने जिन गोपनीय एवं महत्वपूर्ण दस्तावेजों का अवलोकन किया था, सरकार उन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से अब तक इनकार करती रही है। पिछले वर्ष मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज किए जाने पर संसद में विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बाद गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने स्पष्टीकरण दिया था कि इस मामले में (कांग्रेस सांसद) शाह नवाज खान द्वारा 1956 में पेश जाँच रिपोर्ट और (इंदिरा गांधी के जीवनी लेखक) जी.डी. खोसला द्वारा 1970-74 के दौरान की गई जाँच की रिपोर्ट को सरकार (उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश) जस्टिस मनोज मुखर्जी की जाँच रिपोर्ट से अधिक विश्वसनीय मानती है। यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर भारत की जनता यह जरूर जानना चाहेगी कि आखिर वे कौन-से दस्तावेज थे जिनका पूर्ववर्ती जाँच पैनलों ने अध्ययन तो किया था लेकिन जिनको अपनी रिपोर्टों के साथ संलग्न करना जरूरी नहीं समझा। यदि वे दस्तावेज हमारे सामने मौजूद हों तभी सरकार के इस दावे की पुष्टि हो सकेगी कि पूर्ववर्ती जाँच रिपोर्ट अधिक विश्वसनीय हैं। अन्यथा यह निष्कर्ष निकालना निराधार नहीं होगा कि पूर्ववर्ती जाँच आयोग वास्तव में सरकार द्वारा पहले से निर्दिष्ट निष्कर्ष पर पहुँचने और जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए गठित किए गए थे।
यह भी गौरतलब है कि मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट के साथ प्राय: वे सभी दस्तावेज संलग्न किए गए हैं जिनका उसने जाँच के क्रम में अध्ययन किया था। यहाँ तक कि जस्टिस मुखर्जी ने ऐसे दस्तावेज भी लंदन स्थित ब्रिटिश अभिलेखागार से ढूंढ़ निकाले, जिन्हें भारत सरकार 1956 से छिपा रही थी और जिनके आधार पर पहली जाँच के समय ही यह पुष्टि हो सकती थी कि नेताजी की मृत्यु कथित विमान दुर्घटना में 1945 में नहीं हुई थी।
इसलिए पूर्ववर्ती जाँच पैनलों द्वारा जिन दस्तावेजों का अध्ययन किया था, उनकी प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराने के लिए मिशन नेताजी के शयन्तन दासगुप्ता ने पिछले वर्ष सूचना के अधिकार के तहत गृह मंत्रालय में आवेदन किया था। मंत्रालय द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क) के उपबंध का हवाला देते हुए दस्तावेजों की प्रतिलिपि उपलब्ध कराने से इन्कार कर दिए जाने के बाद केन्द्रीय सूचना आयोग में अपील दायर की गई। अक्तूबर, 2006 में आयोग द्वारा इस मामले में पहली सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने उन दस्तावेजों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की थी। उसके बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश पर अपीलकर्ता ने अपने संशोधित आवेदन के साथ ऐसे202 गोपनीय दस्तावेजों की सूची संलग्न कर दी जिनका खोसला आयोग ने जाँच के क्रम में उपयोग किया था। सूचना आयोग ने गृह मंत्रालय को इस मामले पर अगली सुनवाई के दौरान उक्त सभी दस्तावेजों को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। इस लेख श्रृंखला के एक पिछले लेख में मैंने यह आशा व्यक्त की थी कि शायद सरकार केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश का पालन करेगी।
सूचना आयोग के इस सख्त आदेश के बाद आशान्वित इस मामले के अपीलकर्ता शयन्तन दासगुप्ता ने कहा:
जस्टिस मुखर्जी की जाँच रिपोर्ट के निष्कर्ष कि नेताजी की मृत्यु कथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी और उसके बाद सरकार द्वारा उस निष्कर्ष को तर्कहीन ढंग से खारिज कर दिए के बाद हम भारतीयों के लिए उन सभी दस्तावेजों की छानबीन करना जरूरी हो गया है ताकि हम खुद सही निष्कर्ष तक पहुंच सकें। तभी यह साफ हो सकेगा कि भारत की जनता से तथ्यों को छिपाए जाने के पीछे क्या इरादे रहे हैं।
सूचना के अधिकार के तहत नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग का यह आदेश पिछले एक सप्ताह में भारत सरकार के लिए दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले आयोग ने विदेश मंत्रालय को भी 23 मार्च, 2007 को ऐसे ही सख्त आदेश दिए थे। इस मामले में सरकार के शीर्ष नौकरशाह सूचना के अधिकार संबंधी क़ानून के शिकंजे में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं। देखना है कि इस मामले में राजनीतिक नेतृत्व के अवांछित दबाव से मुक्त हो पाने की हिम्मत वे कब जुटा पाते हैं।

आज़ाद भारत में आज़ाद हिंद


देश की आज़ादी के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्थापित की हुई आज़ाद हिंद फ़ौज का उद्देश्य भले पूरा हो गया हो, छत्तीसगढ़ के जंगलों में बसे आज़ाद हिंद फ़ौज के हज़ारों आदिवासी सैनिक अब भी सेना की वर्दी पहने 'आज़ादी' की लड़ाई लड़ रहे हैं.
इन सैनिकों के अपने नियम-क़ायदे हैं, अपना क़ानून और संविधान है, अपनी सरकार है.
इन आदिवासी सैनिकों की वर्तमान सरकार में आस्था तो है लेकिन ये मानते हैं कि जब तक देश और राज्य की बागडोर आदिवासियों के हाथ में नहीं आ जाती तब तक ये आज़ादी अधूरी है.
ज़ाहिर है, इन सैनिकों की पूरी लड़ाई इसी मुद्दे पर केंद्रित है.
वर्ष 1920 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निर्देश पर कांकेर के हीरा सिंहदेव मांझी ने 57 आदिवासी समुदायों को साथ लेकर मध्य भारत के आदिवासियों की आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया और पृथक कंगला मांझी सरकार की घोषणा की.
 हम चाहते हैं कि आदिवासियों को जल, जंगल और ज़मीन पर हक़ मिले. जिन आदिवासियों ने अपना सब कुछ लुटा कर अपने को आज़ादी की लड़ाई में झोंक दिया, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. हम अंतरराष्ट्रीय समाजवाद की स्थापना करना चाहते हैं
 
मंगल सिंह मरकाम

कंगला मांझी सरकार के आदिवासी सैनिकों ने आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष किया.
देश आज़ाद हुआ और इस बात को 58 साल होने को आ गए. लेकिन देश की आज़ादी के बाद भी आदिवासियों की इस फ़ौज ने अपना सांगठनिक ढ़ांचा बरक़रार रखा और अब पीढ़ी दर पीढ़ी इस फ़ौज के सैनिक आदिवासी समाज के हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं.
संगठन में बाक़ायदा अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व के लिए चुनाव होते हैं और नयी कार्ययोजनाओं पर विमर्श होता है.
हालांकि सारे मामलों में राजमाता का फ़ैसला सर्वोपरि होता है.
संगठन में हीरा सिंहदेव मांझी की विधवा बिरझा देवी को राजमाता का दर्जा प्राप्त था, जिनका इसी वर्ष निधन हो गया. उसके बाद संगठन की कमान उनकी दूसरी पत्नी फुलवा देवी ने संभाली है.
ख़राब माली हालत
आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों की मांग है कि वर्तमान व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए शासकीय नियुक्तियों में केवल फ़ौज के सैनिकों की ही भर्ती की जाए.
प्रत्येक सैनिक परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाए. इसके अलावा आदिवासी समाज के तमाम विवादित मुद्दों को निपटारे के लिए थाने और अदालत के बजाय आदिवासी पंचायत के हवाले कर देना चाहिए.
साथ ही फ़ौज से जुड़े सभी आदिवासी सैनिकों को 5-5 एकड़ कृषि योग्य ज़मीन भी सरकार की ओर से मिलनी चाहिए.
 राजनीतिज्ञों को जब ज़रुरत होती है तो वो हमारे पास आते हैं लेकिन जब हमारी बारी आती है, तो उनके पास हमारे लिए समय नहीं होता.” 
 
ख़ुशेंगा

मांगों की एक लंबी-चौड़ी सूची है.
हालांकि आज़ाद हिंद फ़ौज के इन सैनिकों की माली हालत ख़राब है. आज़ाद हिंद फ़ौज की हरी वर्दी पहनने वाले बुजुर्ग और उनके बच्चों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार अब भी नगण्य है.
अंधविश्वास ने कहीं गहरे तक इन्हें जकड़ रखा है. अधिकतर सैनिक मज़दूरी करके अपनी आजीविका चला रहे हैं. लेकिन इनके हौसले बुलंद हैं.
स्टार लगी हुयी वर्दी और “नया समाजवाद सरकार ” की बैज लगाए युवा और बुजुर्ग सैनिकों में लड़ने का जज़्बा अब भी बरक़रार है.
शायद यही कारण है कि चल-अचल संपत्ति की ख़रीद-बिक्री के लिए मांझी सैनिकों के बीच आज भी आज़ाद हिंद फ़ौज का स्टॉम्प पेपर चलन में है.
“भारत भूमिका ” नामक संविधान और “ क़ानूनी रजिस्टर ” का पालन करना तो इन सैनिकों के लिए एक अनिवार्य नियम की तरह है.
मांझी सरकार में आस्था रखने वाले आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों का आरोप है कि पाँच सितंबर, 1984 को संगठन के मुखिया हीरा सिंहदेव मांझी की मौत के बाद देश की सरकार का रवैया बदल गया है.
जनजातीय संगठनों की भूमिका को रेखांकित करने के उद्देश्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने मांझी सरकार की स्थापना करने वाले हीरा सिंहदेव मांझी को किसी ज़माने में सम्मानित भी किया था लेकिन इन सैनिकों का कहना है कि आज की सरकार इनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार करती है और नौकरशाह इनका मज़ाक उड़ाते हैं.
कहीं सुनवाई नहीं
खेती और मज़दूरी से समय निकाल कर बैठक, धरना, जुलूस निकालने वाले पूरे राज्य में फैले आज़ाद हिंद फ़ौज के लगभग 10 हज़ार आदिवासी सैनिकों के इस संगठन के राजेश्वर अर्थात सचिव मंगल सिंह मरकाम कहते है, “ हम चाहते हैं कि आदिवासियों को जल, जंगल और ज़मीन पर हक़ मिले. जिन आदिवासियों ने अपना सब कुछ लुटा कर अपने को आज़ादी की लड़ाई में झोंक दिया, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. हम अंतरराष्ट्रीय समाजवाद की स्थापना करना चाहते हैं.”
अंतरराष्ट्रीय समाजवाद की स्थापना के सपने संजोने वाले मंगल सिंह अपने को धमधागढ़ रियासत का वारिस बताते हैं. लेकिन छूटते ही यह बताना नहीं भूलते कि आज उनके पास कुछ भी नहीं है.
मंगल सिंह मरकाम की 15 एकड़ ज़मीन पर गांव के एक प्रभावशाली व्यक्ति ने बरसों से कब्जा जमा रखा है, जिसके लिए उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री तक से फरियाद की लेकिन कुछ नहीं हुआ.
आज़ाद हिंद फ़ौज
अब भी कई बुज़ुर्ग संगठन का हिस्सा हैं

परंपरा बैगा कहलाने वाले आज़ाद हिंद फ़ौज के राज्य प्रमुख और धर्म गुरु शिव कुमार खुशेंगा का दावा है कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ठ्र, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और बिहार में मांझी व गौंड़ समुदाय से जुड़े लगभग दो लाख सैनिक सक्रिय हैं और उनका संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला है.
अपना ज़्यादातर समय पूजा-पाठ में गुजारने वाले बांधा गांव के निवासी खुशेंगा राजनीतिज्ञों से ख़ासे नाराज़ हैं. वे कहते हैं, “ राजनीतिज्ञों को जब ज़रुरत होती है तो वो हमारे पास आते हैं लेकिन जब हमारी बारी आती है, तो उनके पास हमारे लिए समय नहीं होता.”
बहरहाल आज़ादी की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन आदिवासी सैनिकों ने पिछले कुछ सालों से 15 अगस्त को गुलामी दिवस मनाना शुरु किया है.
गुलामी दिवस क्यों, इसका जवाब हमें संगठन की बिलासपुर जिला इकाई के युवा सदस्य संतोष सिंह ने दिया, “ क्योंकि ये आज़ादी झूठी है 

'नेताजी की हत्या का आदेश


ब्रितानी ख़ुफ़िया एजेंटों को 1941 में आदेश दिया गया था कि वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या कर दें.
एक आयरिश इतिहासकार यूनन ओ हैल्पिन का कहना है कि जब नेताजी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की तो ब्रितानी सरकार ने उन्हें ख़त्म करने का आदेश दिया.
ओ हैल्पिन ब्रितानी ख़ुफ़िया सेवाओं पर पहले भी कई किताबें लिख चुके हैं.
उनका कहना है कि ब्रितानी ख़ुफ़िया सेवा के अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि मध्य पूर्व से होकर जर्मनी जाने की कोशिश कर रहे नेताजी को बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाए.
लेकिन वे अपने इस मंसूबे में सफल नहीं हो पाए, माना जाता है कि नेताजी की मौत 1945 में ताईवान में एक विमान दुर्घटना में हो गई, हालाँकि इस पर भी लंबे समय से विवाद चलता रहा है.
ओ हैल्पिन का कहना है कि जब ब्रितानी सरकार को पता चल गया कि नेताजी दुश्मन देशों की मदद लेकर ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो ख़ुफ़िया अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिए गए कि उन्हें मार डाला जाए.
राज़
कोलकाता में एक भाषण में ओ हैल्पिन ने गुप्त दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए अपनी बात कही, उन्होंने बताया कि ब्रितानी एजेंट इस बात को लेकर परेशान थे कि नेताजी आख़िर कहाँ हैं, वे जनवरी 1941 में अचानक लापता हो गए थे.
दस्तावेज़
हैल्पिन ने गुप्त दस्तावेज़ों के हवाले से अपनी बात कही है

हैल्पिन ने बताया, "ख़ुफ़िया एजेंटों ने सोचा कि नेताजी सुदूर पूर्व की तरफ़ गए हैं लेकिन एक इतालवी संदेश से उन्हें पता चला कि वे काबुल हैं और मध्य पूर्व के रास्ते जर्मनी जाने की तैयारी कर रहे हैं."
"इसके बाद तुर्की में तैनात दो जासूसों को लंदन स्थित मुख्यालय से निर्देश दिया गया कि वे सुभाष चंद्र बोस को जर्मनी पहुँचने से पहले खत्म कर दें."
हैल्पिन का कहना है कि जासूस नेताजी तक नहीं पहुँच पाए क्योंकि वे मध्य एशिया होते हुए रूस के रास्ते जर्मनी पहुँच गए.
हैल्पिन का कहना है कि ब्रितानी सरकार बोस को लेकर बहुत चिंतित थी और उन्हें एक गंभीर ख़तरे के रूप में देख रही थी.
इतिहासकार
नेताजी के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकारों का कहना है कि इस नई जानकारी के सामने आने से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे करिश्माई नेताओं में से एक, सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय जीवन में एक अध्याय जुड़ गया है.
कोलकाता की प्रमुख इतिहासकार लिपि घोष का कहना है कि अँगरेज़ों ने बोस से मिलने वाली चुनौती का सही आकलन किया था और इससे यह भी पता चलता है कि ब्रितानी हुकूमत उनसे कितना घबरा रही थी.
नेताजी के पड़पोते और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर सुगत बोस कहते हैं, "उन्होंने जिस तरह से भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी को देश हित में और ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ प्रेरित किया था, उनके पास ऐसा आख़िरी क़दम उठाने का कारण मौजूद था."
नेताजी ने हत्या की इस कोशिश को नाकाम करते हुए आज़ाद हिंद फौज का गठन किया और पूर्वोत्तर भारत में ब्रितानी सेना को चुनौती दी.

अब छत्तीसगढ़ में सुभाष चंद्र बोस


रायगढ़, छत्तीसगढ़ से
कार्यालय पुलिस अधीक्षक, रायगढ़ (छ.ग.)
क्रमांकः पुअ/ राय/ सीसी/ ए/ 701-ए/ छग/ 21-ए/ 07 दिनांक 20.08.07

प्रति,
उप पुलिस महानिरीक्षक
नेताजी जिंदा हैं ?
शिवकुमार का दावा कोई इकलौता मामला नहीं है. देश में नेता जी के जिंदा होने के अलग-अलग दावे होते रहे हैं.
(शिकायत)
पुलिस मुख्यालय, रायपुर

विषयः नेताजी सुभाष चंद्र बोस के फोटोग्राफ्स के संबंध में

संदर्भः आपका पत्र क्रमांक/ पुमु/ ज. शिका/ निवा/ 15/07 दिनांक 7.5.07

संदर्भित पत्र का अवलोकन करने का कष्ट करें. शिकायत पत्र की जांच थाना कोतवाली रायगढ़ से कराई गई है. जांच पर पाया गया कि आवेदक शिवलाल केवला बाड़ी, बस स्टैंड, रायगढ़ से कथन लिया गया. आवेदक ने अपने कथन में बताया कि इनके भांजा हितेश कुमार सिंघानियां की शादी मंगलम विवाह घर रायगढ़ में दिनांक 27.1.05 को हुई जिसमें 111 (एक सौ ग्यारह) वर्षीय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, प्रथम राष्ट्रपति आजाद हिंद सरकार आशीर्वाद देने पहुंचे थे.

आवेदक नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी का अनुयायी है, जो आज भी उनको जीवित होना मानते हैं. मामला पुलिस हस्तक्षेप योग्य अपराध का होना नहीं पाया गया.

जांच प्रतिवेदन सादर प्रस्तुत है.


पुलिस अधीक्षक
रायगढ़

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस








नेताजी सुभाषचन्द्र बोस


सुभाषचन्द्र बोस (:शुभाष चॉन्द्रो बोशु) (23 - january 1897 - 18 august, 1945 विवादित) जो नेताजी नाम से भी जाने जाते हैं,bharat के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। 2nd world war  के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने japan  के सहयोग से ajad hind fauz का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा, bharat का राष्ट्रीय नारा बन गया हैं।
1944 में अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर  से बात करते हुए, mahatma gandhi ने नेताजी को देशभक्तों का देशभक्त कहा था। नेताजी का योगदान और प्रभाव इतना बडा था कि कहा जाता हैं कि अगर उस समय नेताजी bharat में उपस्थित रहते, तो शायद bharat एक संघ राष्ट्र बना रहता और bharat ka dividation न होता। स्वयं gandi G  ने इस बात को स्वीकार किया था।

                                                           


नेताजी सुभाषचन्द्र बोस



नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23- january 1897 को  उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस  कटक शहर के मशहूर वकील थे। पहले वे सरकारी वकील थे, मगर बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने  कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार कोकोलकाता  का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाषचंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थें। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थें। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था। 


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स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश और कार्य



कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी,  देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर, सुभाष दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। England से उन्होंने दासबाबू को खत लिखकर, उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार, india वापस आने पर वे सर्वप्रथम mumbai गये और गाँधीजी se मिले। mumbai में गाँधीजी मणिभवन में निवास करते थे। वहाँ, 20 july, 1921 को गाँधीजी और सुभाषचंद्र बोस के बीच पहली बार मुलाकात हुई। गाँधीजी ने भी उन्हें  कोलकाता  जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। इसके बाद सुभाषबाबू  कोलकाता आ गए और दासबाबू से मिले। दासबाबू उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। उन दिनों गाँधीजी अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया था। दासबाबू इस आंदोलन का bangal में नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ सुभाषबाबू इस आंदोलन में सहभागी हो गए 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी   की स्थापना की। bidhansbha के अंदर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिए, कोलकाता महापालिका का चुनाव स्वराज पार्टी   ने लड़कर जीता। स्वयं दासबाबू कोलकाता के महापौर बन गए। उन्होंने सुभाषबाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाषबाबू ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला .,कोलकाता के रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें  भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करनेवालों के परिवार के सदस्यों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।कांग्रेस बहुत जल्द ही, सुभाषबाबू देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडन्स लिग  शुरू की। 1928 में जब साइमन कमीशन india आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता  में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन  को जवाब देने के लिए,  कांग्रेस 

ने india का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को  स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को  डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह मॉंग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस  स्वराज  की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस  का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू  की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 january का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।
26 january, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया। जब सुभाषबाबू जेल में थे, त बगाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझोता किया और सब कैदीयों को रिहा किया गया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारकों को रिहा करने से इन्कार कर दिया।भगत सिंह  की फॉंसी माफ कराने के लिए, गाँधीजी ने सरकार से बात की। सुभाषबाबू चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझोता तोड दे। लेकिन गाँधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोडने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अडी रही और भगत सिंह और उनके साथियों को फॉंसी दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर, सुभाषबाबू गाँधीजी और कांग्रेस के तरिकों से बहुत नाराज हो गए