Thursday, 29 September 2011

shanker sena .

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अब हमेँ तलवार उठानी ही पडेगी ।
 दुश्मनोँ को अपनी ताकत दिखानी ही पडेगी ।
 हम नही कहते हिँसा करो मगर
हिँसा करने वालो को सबक सिखानी ही पडेगी ।

 बहुत हुई विनय व अहिसा की बाते
अब हर बात उनको उन्हीँ की जुँबा मेँ समझानी पडेगी ।
 हम नहीँ कहते तलवार उठा लो मगर ,
ढाल तो हमेँ अब उठानी ही पडेगी ।

 बहुत हुई गाँधीगीरी की बाते ,
अब तो गीता अपनानी पडेगी ।
 हममे से किसी न किसी को तो ,
 सनातन धर्म के लिए आवाज उठानी ही पडेगी

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सजा दो मौत की , वतन के साथ जो चाल करेँ ।
यह सरजमीँ नहीँ ऐसे बदचलन के लिए । 1 ।
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  जागो हिन्दुओँ जागो

आखिर कब खत्म होगा , कश्मीरी हिन्दुओँ का वनवास । 2011 मेँ कश्मीरी हिन्दुओँ के वनवास के 20 साल पूरे हो गये है । पर आज भी न तो कश्मीरी हिन्दु कश्मीर लौट सकते और ना ही सरकार इनके बारे मेँ सोच रहीँ है । इसलिए आज मैँ हिन्दुओँ से पूछता हुँ , कि आखिर कब कश्मीरी हिन्दुओँ को उनका खोया हुआ घर मिलेगा ? यह प्रश्न आज भी बना हुआ है और इसका जवाब आज भी किसी के पास नहीँ हैँ । इसलिए मैँ कहता हूँ कि मेरे हिन्दु भाइयोँ " जागो " अपना भला खुद सोचोँ वरना एक दिन पूरा हिन्दुस्तान कश्मीर बन जायेगा , और आप कुछ नहीँ कर पायेगेँ । इसलिए भाइयोँ आप लोग कश्मीरी हिन्दुओँ की मदद करेँ ।

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एक हिन्दू: क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं
आओ साथियों, देशवासियो
भारत तुम्हें दिखाते हैं ॥
जिस गौ को गौमाता कहकर
गाँधी सेवा करते थे
जिसके उर में सभी देवता
वास हमेशा करते थे
हिन्द भले ही मुक्त हुआ हो
गौमाता बेहाल अभी
कटती गऊएँ किसे पुकारें
उनके सर है काल अभी
गौमाता की शोणित-बूँदें
जब धरती पर गिरती हैं
तब आज़ादी की व्याख्याएँ
ज्यों आरी से चिरती हैं
गौ भारत का जीवन-धन है
हिन्दू चिन्तन की धारा
गौमाता को जो काटे, वह
है माता का हत्यारा
कृष्ण कन्हैया की गऊओं की
गाथा करुण सुनाते हैं
कया खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं ॥
हिन्द देश की भाषा हिन्दी
संविधान में माता है
मैकाले की अँग्रेजी से
भारत जाना जाता हैं
राजघाट से राजपाट तक
अँग्रेजी की धूम बड़ी
औ’ हिन्दी, झोपड़-पटटी में
कैसी है मजबूर खड़ी
न्यायालय से अस्पताल तक
भाषा अब अँग्रेजी है
हिन्दी संविधान में बन्दी
रानी अब अँग्रेजी है
मन्त्री जी से सन्त्री जी तक
बोलें सब अँग्रेजी में
हर काँलिज, हर विद्यालय में
डोंलें सब अँग्रेजी में
अपनी भाषा हिन्दी से हम
क्यों इतना कतराते हैं
क्या खोया है.

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shanker sena

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                                 SHANKER SENA

 हिन्दुत्व की एक आवाज

 हमने शँकर  सेना नाम से एक सँगठन बनाया है । SHANKER SENA  का मकसद है एक वतन बनाना एक ऐसा वतन जहँ का इन्सान पर जुल्म बर्दाश्त न करे । यह मुश्किल है पर असंभव नहीं । हिन्दुस्तान जहाँ इतनी सारी जातियाँ, भाषाऐं , कल्चर हैं उसे एक साथ जोडे रखना आसान नहीं । मगर इस बात को हम आज नहीं समझेंगे और इस मसले को लेकर आज संघर्ष नहीं करेंगे । तो आने वाला हिन्दुस्तान एक कमजोर मुल्क होगा । और यह सिर्फ  एक भ्रष्ट शोषक और साम्प्रदायिक समाज़ बन कर रह जायेगा । इसलिए SHANKER SENA हम सब को मिलकर बनाना है । आप यह ना सोचे कि दुसरे हमारा साथ देँगे या न देगेँ । आप सिर्फ यह सोचे कि क्या आप हमारा साथ देगेँ ? क्या आप इस लडाई मेँ मेरे साथ है ? क्या आप लोग मेरे साथ हैं ?  यदि हाँ तो यकीन मानिए आज नहीँ तो कल जीत हमारी ही होगी । यदि आप बदलाव चाहते है , और हमारे जैसी सोच रखते हैँ तो हमारे सँगठन का सदस्य बनिए । आपके सुझाव आमँत्रित है । जय हिन्द , जय भारत .

आपका
SAURABH SHANKER
( राष्ट्रीय अध्यक्ष , शंकर सेना  ) 
09582720908
Email - id : shankersena.india@gmail.com

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आप सभी का नेह आपके स्क्रेप्स और testimonials के माध्यम से मिलता रहता हैं. सकल SHANKER SENA परिवार आपका ऋणी हैं.
HAMARI मैत्री-श्रृंख्ला इतनी व्रहद हो गई हैं की सभी से एक साथ संपर्क में रह पाना कठिन हो गया हैं. अतः एक सरल सा उपाए सभी से जुड़े रहने का हमने ढूंढ़ लिया हैं. बस आपको करना ये हैं की अपने मोबाइल के create msg में जाकर
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इसके बाद आप जुड़ जायेंगे Shanker sena के मोबाइल नेटवर्क से वो भी बिलकुल फ्री...(निःशुल्क).
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रेगार्ड्स
saurabh pandey

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                                       शंकर सेना

1. शंकर सेना एक सामाजिक व धार्मिक संगठन है ।
2. शंकर सेना की सदस्यता मुफ्त हैँ । 
3. शंकर सेना का लक्ष्य कश्मीरी हिन्दुओ को उनका हक दिलाना है ।
4. शंकर सेना का लक्ष्य हिन्दुस्तान को एक मजबूत राष्ट्र बनाना है । और हिन्दुओँ मेँ एकता लाना है ।

5. शँकर सेना किसी भी सदस्य को भारतीय संविधान के खिलाफ जाने की इजाजत नहीँ देता हैँ ।
6. All sorce from internet & news .
7. शँकर सेना का उद्‌देश्य समाज मेँ जागरण लाना है और गुरु गोविन्द सिँह , गुरू रणजीत सिँह , शिवाजी महाराज , स्वामी विवेकानन्द के विचारो को लोगो तक पहुँचाना है ।
और जानने के लिए Plz visit करेँ www.shankersena.blogspot.com   
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          अहिंसा

अहिँसा एक ऐसा शब्द हैँ जिसने हम भारतीयोँ को नपुँसक बना दिया हैँ । आज हर इँसान अहिंसा की बाते करता है . गाँधीवादी विचारधारा की बातेँ करता हैँ । पर सोचोँ की क्या हमेँ आजादी अहिँसा से मिली ? नहीँ । हमनेँ आजादी के लिए खून बहाया है , हमारे शहीदोँ ने आजादी के लिए कुर्बानीयाँ दी है , तब जाकर हमेँ यह आजादी मिली है । इसलिए मैँ कहता हूँ कि गीता पढोँ । तभी आप अपना विकास कर पावोगे ।
भगवान श्री विष्णु ने गीता मेँ कहा है कि " जो भी तुम्हारे धर्म का अपमान करें या नुकसान पहुँचाये तो उससे अपने सारे रिस्ते तोड दो । और अगर हो सके तो ऐसे लोगो का वध कर दो । " जैसे अर्जुन ने महाभारत मेँ कौरवो का वध कर दिया था ।
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जय श्री राम , हर हर महादेव
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Tuesday, 20 September 2011

shanker sena

केरल मे मुस्लिम आबादी  बढ़ रही है
बंगाल मे .... असम मे ..... !!

सेकुलर कीड़े अक्सर ये बाते नकार देते है :

ईरान पहले भारत का भाग था
उसे अलग किया इस्लामिक देश बनाया

अफगानिस्तान 1761 से पहले भारत का भाग था
उसे अलग किया इस्लामिक देश बनाया

पाकिस्तान 1947 से पहले भारत का भाग था
उसे अलग किया इस्लामिक देश बनाया

बांग्लादेश 1971 से पहले भारत का भाग था
उसे अलग किया इस्लामिक देश बनाया

आजाद कश्मीर 1952 से पहले भारत का भाग था
उसे अलग किया इस्लामिक देश बनाया

इस्लाम साम्राज्य वाद मे विश्वास करता है उसका पहला पाठ यही है की जब तक पूरी दुनिया मे इस्लाम कायम नहीं होगा तब तक मोहम्मद नहीं आएगा !! इसलिए हर मुस्लिम भले ही आमिर खान हो या ओसामा बिन लादेन कोशिश करता है जन्नत मे जाने की ....

एक सेकुलर हथियार के साथ लव जिहाद अपनाता है तो ओसामा लोगो को मारता है

कश्मीर असम बंगाल को मिलकर मुगलिस्तान बनाने की बाते हो रही है प्रधानमंत्री बांग्लादेश को जमीन गिफ्ट करके आते है वित्त मंत्री इस्लामिक बेंक का स्वागत करते है

गृह मंत्री अफजल की दाढ़ी पर मक्खन लगाते है और बॉलीवुड के सेकुलर प्रशंसक दक्षिण पंथियों को गरियाते है

भारत राजस्थान जितना भी होगा फिर भी सेकुलर "Hindu Muslim Unity ..." कौमी एकता .... की गंदगी छेड़ते रहेंगे

स्वामी अग्निवेश के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे

दिल्‍ली। अन्ना हजारे व उनके सहयोगियों की गतिविधियों के बारे में पल-पल की जानकारी सरकार तक पहुंचाने के आरोपों से घिरे स्वामी अग्निवेश के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया है। रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर अग्निवेश के खिलाफ आर्य समाज के सदस्यों ने प्रदर्शन किया है। इनकी मांग है कि स्वामी अग्निवेश की भूमिका की जांच होनी चाहिए। सूत्रों ने बताया कि स्वामी अग्निवेश की भूमिका पहले ही संदिग्ध थी इसीलिए अन्ना की टीम से इतर वह अपनी बयानबाजी से हमेशा सरकार के पाले में दिखते थे।

आपको बता दें कि स्वामी अग्निवेश एक विवादास्पद वीडियो के बाद विवादों में आए। उस वीडियो में अग्निवेश कथित रूप से एक केंद्रीय मंत्री कपिल से बात करते हुए कह रहे हैं कि सरकार को गांधीवादी अनशनकारी के खिलाफ कड़ा कदम उठाना चाहिए। हालांकि अग्निवेश ने उस वीडियो फुटेज के बारे में दावा किया कि वह मनगढ़ंत और मिलावटी है और उनके खिलाफ कलंक लगाने का अभियान है। उन्होंने इस बात से इंकार किया वह केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल से बात की थी। सिब्बल टीम अन्ना और सरकार के बीच गतिरोध दूर करने के लिए शुरुआती दौर की वार्ता में शामिल थे।

टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी ने आरोप लगाया कि अग्निवेश को कैमरे में कैद किया गया है, जहां वह एक व्यक्ति को कपिल कहकर संबोधित कर रहे थे.. महाराज आप इनको इतना क्यूं दे रहे हैं। किरण बेदी ने कहा, महाराज कौन हैं? क्या दूसरी ओर कपिल सिब्बल हैं। उन्होंने कहा, सिब्बल साहब, मैंने यह सुना। किरण ने अग्निवेश पर पूरी तरह से अनैतिक होने का आरोप लगाया। हजारे के अनशन के दौरान अन्ना पक्ष और अग्निवेश के बीच मतभेद पैदा हो गए थे।

किरण ने कहा, हम सभी लोग इससे हैरान हैं और हम इससे बहुत असहज महसूस कर रहे हैं। केवल वही इसका जवाब दे सकते हैं। उन्हें इसे स्वीकार करना चाहिए या खारिज करना चाहिए। हालांकि इसमें कोई शक नहीं है। यह हमें जाहिर तौर पर बता रहा है कि क्या हुआ। उन्हें हमें बताना चाहिए कि वह कौन है जिसके बारे में उन्होंने जिक्र किया। अग्निवेश ने कहा, ये झूठ है और यह कट-पेस्ट का काम है। मेरे निजी जानकारी में कई लोग हैं जिनका नाम कपिल है। मैं किसी नेता को महाराज कहकर संबोधित नहीं करता हूं। कपिल महाराज कोई भी हो सकता है। वैसे एक कपिल मुनि भी सामने आए हैं पर उन्होंने कहा कि मेरी स्वामी अग्निवेश के साथ कोई बातचीत नहीं हुई है।

अफजल के क्षमादान प्रस्ताव पर चर्चा 28 को


श्रीनगर। संसद पर हमले के दोषी अफजल को क्षमादान देने के विवादास्पद प्रस्ताव पर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 28 सितंबर को चर्चा होगी और मतदान होगा।
यह प्रस्ताव निर्दलीय विधायक शेख अब्दुल रशीद ने पेश किया है, जिसमें अफजल को क्षमादान देने की मांग की गई है। अफजल को संसद पर हुए दिसंबर 2001 के हमले में संलिप्तता के चलते मौत की सजा सुनाई गई है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में तीन दोषियों की मौत की सजा माफ करने की मांग करते प्रस्ताव को तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित करने के बाद राशिद ने यह प्रस्ताव पेश किया है।
विधानसभा सचिवालय को विधायकों से 39 प्रस्ताव मिले थे लेकिन नियमों के तहत किसी एक सत्र में सिर्फ सात प्रस्तावों पर ही चर्चा और मतदान हो सकता है। इस संबंध में कल ड्रा निकाला गया और राशिद का प्रस्ताव दूसरे स्थान पर चुना गया।
सत्तारूढ़ गठबंधन को छोड़कर घाटी के अलगाववादी और मुख्यधारा वाले नेताओं ने अफजल को क्षमादान देने की मांग का किसी न किसी रूप में समर्थन किया है, जबकि जम्मू के नेताओं ने इस विचार का विरोध किया है।
पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पुत्री मेहबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी ने कहा है कि अफजल को मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि उसे फांसी देने से कश्मीर के हालात पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। 

स्वामी अग्निवेश की गिरफ्तारी के लिए दिल्ली में छापे


हांसी/हिसार [संवाद सहयोगी]। अमरनाथ यात्रा पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोपों में घिरे स्वामी अग्निवेश की तलाश में रविवार को पुलिस ने नई दिल्ली में छापामारी की। अदालत ने स्वामी अग्निवेश को गिरफ्तार कर 19 सितंबर तक अदालत में पेश करने का आदेश दिया है।
उल्लेखनीय है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वामी अग्निवेश ने हिसार सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी जहां सुनवाई के बाद अदालत ने दो दिन पहले याचिका खारिज कर दी थी।
हांसी के न्यायिक दंडाधिकारी अश्वनी महता ने हांसी के डीएसपी को स्वामी अग्निवेश को 19 सितंबर तक गिरफ्तार करने का आदेश दिया था। स्वामी अग्निवेश की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शहर थाना में कार्यरत सब इंस्पेक्टर महेंद्र लाल व डोंगर सिंह के नेतृत्व में पुलिस की दो टीमें गठित कर दिल्ली रवाना की गई।
बताया जाता है कि पुलिस टीमों ने दिल्ली में स्थित स्वामी अग्निवेश के आधा दर्जन ठिकानों पर छापे मारे। हांसी के डीएसपी जयप्रकाश ने बताया कि दोनों टीमों के हांसी लौटने के बाद ही पूरी जानकारी मिल सकेगी। उन्होंने बताया कि सोमवार को हांसी की अदालत में पुलिस स्वामी अग्निवेश की गिरफ्तारी के प्रयासों पर आधारित रिपोर्ट पेश करेगी। 

कश्मीरी नेताओं का मिजाज


एक सप्ताह के अंतराल में नेशनल कांफ्रेंस के सबसे महत्वपूर्ण नेता ने दो बयान दिए। पहला बयान संसद पर आतंकी हमले के दोषी मोहम्मद अफजल के प्रति 'नरमी' बरतने की मांग और इसके लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पास करने की कल्पना पर था। इससे प्रेरित होकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में एक विधायक वैसा प्रस्ताव ला भी चुका है। दूसरे बयान में दिल्ली हाईकोर्ट विस्फोट का दोषी सुरक्षा एजेंसियों को ठहराया गया है कि उनकी लापरवाही से यह हुआ। इन बयानों से कश्मीरी मुस्लिम नेताओं की मानसिकता स्पष्ट हो जाती है। जिस मोहम्मद अफजल के पक्ष में कश्मीरी नेता सुरक्षा बलों के विरुद्ध बंद, जुलूस आयोजित करते रहते हैं वह एक दोषसिद्ध आतंकवादी है। वह यहां तक कह चुका है कि उसे अपने किए का कोई पछतावा नहीं और मौका मिला तो वह फिर यही करेगा। इन दो बयानों का अर्थ यह है कि मुस्लिमों, विशेषकर कश्मीरी मुस्लिमों के जघन्य से जघन्य अपराध का कोई नोटिस न लिया जाए। यह है कश्मीरी मुस्लिम मानसिकता, क्योंकि नेशनल कांफ्रेंस उसी की 'उदार' प्रतिनिधि है। यदि उदार चिंतन ऐसा है तो बाकी कश्मीरी नेताओं के मिजाज का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
इस विशेषाधिकारी मानसिकता को समझे बिना कश्मीर पर सम्यक नीति नहीं बन सकती। विस्थापित कश्मीरी कवि कुंदनलाल चौधरी की एक कविता 'माई क्लीनिक एट छोटा बाजार' में इस मानसिकता की झलक मिलती है कि कैसे 1980 के दशक के अंत में कश्मीर से हिंदुओं को मार भगाने की नीति सफल हुई। तब राज्य प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए पीड़ित हिंदुओं की ओर से ही माफी मांगने की नीति पर चल रहा था। भारत के जो नीति-निर्माता, पत्रकार और बुद्धिजीवी कश्मीरी जनता की 'उचित शिकायतों' का रोना रोते या विकास आदि की चिंता करते हैं उनके लिए इस प्रसंग में गहरी सीख है। कश्मीरी मुस्लिमों को किसी विकास से मतलब नहीं है। इसी बड़े नेता ने कुछ महीने पहले ही यह बयान भी दिया था कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की आकांक्षा केवल विकास, अच्छा प्रशासन और आर्थिक लाभों से नहीं संतुष्ट हो सकती। उसे एक राजनीतिक समाधान चाहिए। अत: कश्मीरियों को आर्थिक, प्रशासनिक गड़बड़ी आदि की समस्या नहीं है। लंबे समय से शेष भारत द्वारा उन्हें निरंतर दिया जा रहा अति-उदार आर्थिक अनुदान और विविध विशेष सुविधाओं का पूरा ढेर उनके लिए पर्याप्त नहीं है।
तब उन्हें क्या चाहिए? इसका जवाब है-अधिक स्वायत्तता। जान पड़ता है कि उन्हें कितना भी 'विशेष' अधिकार दे दिया जाए, वे हमेशा यही कहेंगे कि उन्हें इच्छित स्वायत्तता हासिल नहीं है। यद्यपि वे कभी नहीं बताते कि भारतीय संविधान की किस धारा से उनकी किसी भी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक इच्छा पर बाधा आती है? तब और स्वायत्तता के लिए उन्हें क्या चाहिए? इसका संकेत देते हुए उक्त नेता ने अपने उसी बयान में आगे कहा था, 'मैं स्वायत्तता से भी आगे बढ़ने से नहीं कतराता, यदि कोई और समाधान भारत और पाकिस्तान, दोनों को मंजूर हो तथा जम्मू और कश्मीर के लोगों की आकांक्षा के अनुरूप हो'। यह कुछ विचित्र है। इसमें एक असंभव बात रखी गई है। पाकिस्तान कश्मीर को हड़पना चाहता है। क्या यही कश्मीरियों की 'आकांक्षा' है? बिलकुल नहीं! वे पाकिस्तान का अंग होने का अर्थ अच्छी तरह जानते हैं। कुछ स्वाद तो उन्हें 1947 में ही मिल गया था, जब उनके 'मुक्तिदायी' आक्रमण से त्रस्त होकर वे भारत का अंग बनने के लिए व्याकुल हो गए थे। अब पिछले दो-तीन दशक के पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जिहादी अनुभव से स्पष्ट है कि पाकिस्तान का अंग बनते ही कश्मीर को कंधार की तरह उजाड़ होने में अधिक देर नहीं लगेगी। इसीलिए यूरोपीय एजेंसियों द्वारा कराए गए विभिन्न जनमत-संग्रहों में यह बात सामने आई है कि कश्मीरी जनता पाकिस्तान में मिलना नहीं चाहती। हुर्रियत तथा आतंकवादी गिरोहों से जुड़े कुछ कश्मीरी ही पाकिस्तान से मिलना चाहते हैं। चाहे कश्मीरी मुसलमान पाकिस्तान के साथ मिलना नहीं चाहते, पर वे भारत पर धौंस जमाना चाहते हैं कि उनके पास 'विकल्प' है। इस प्रकार, एक स्थायी शिकायती मुद्रा अपना कर वे भारत का अधिकाधिक दोहन करते रहना चाहते हैं।
इसी कारण जब कश्मीर में अधिक समय तक शांति रहती है तो स्वयं कश्मीरी नेताओं को चिंता होने लगती है! किसी न किसी बहाने वे माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। नेशनल कांफ्रेंस या पीडीपी के बयानों, क्रियाकलापों को इस रूप में भी देखना चाहिए। जब-तब बिना किसी प्रसंग कभी 'और स्वायत्तता', 'जनमत-संग्रह' या 'दोहरी संप्रभुता' जैसे शिगूफे इसीलिए छोड़े जाते हैं। अभी मुहम्मद अफजल को सजामुक्त करने या 'नरमी' बरतने का शिगूफा उसी की नई कड़ी है।
संभवत: कश्मीर में थोड़ी-बहुत 'अशांति' बने रहना कश्मीरी मुस्लिम नेताओं को अपनी राजनीतिक जरूरत लगती है। ताकि वे सुरक्षा बलों पर आरोप लगाते रह सकें, ताकि वे नई दिल्ली से मनमानी मांग कर सकें, ताकि स्वयं उनसे कोई किसी बात का हिसाब न मांगे-न स्थानीय जनता, न शेष भारत। जम्मू और लद्दाख कश्मीरी मुसलमानों की अहंमन्यता और शोषण का शिकार रहे हैं। ये भारत का पूर्ण अंग बन कर रहना चाहते हैं। अत: इन क्षेत्रों को स्वायत्त क्षेत्र या केंद्र शासित प्रदेश बनाकर कश्मीर में एक बड़े वर्ग द्वारा दिखाई जा रही अहंमन्यता और लूट पर लगाम लगाई जा सकती है।
[एस. शंकर: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं] 

समाचार गढने की प्रवृति धर्म के लिए घातक-धरानन्द ब्रह्मचारी


कोरी कल्पना का समावेश कर समाचार गढने की प्रवृति  धर्म के लिए घातक-धरानन्द ब्रह्मचारी
अनिल बिष्ट
हरिद्वार। श्री शंकराचार्य आश्रम हरिद्वार के प्रभारी एवं सार्वभौम गंगा सेवा अभियान उत्तराखण्ड के गंगा सेवा पाल ब्रह्मचारी श्री धरानन्द जी ने ऐतिहासिक तथ्यों के अन्वेषण के बजाये उनमें कोरी कल्पना का समावेश कर समाचार गढने की प्रवृति को परम्परा और धर्म के लिये घातक बताते हुए स्थानीय समाचार पत्र में चौसर के कारण खाली रही ज्योतिष पीठ शीर्षक से प्रकाशित समाचार को भ्रामकतथ्य विहिन व निन्दनीय बताते हुए इसका खण्डन किया गया है।
ज्ञातव्य है कि उक्त समाचार पत्र ने किसी गोपनीय माध्यम के हवाले से यह कहने का प्रयास किया है। कि ज्योतिषपीठ‘ है की गद्दी १६४ वर्षो तक इसलिये खाली रही क्योंकि १८७६ ई० में उस पर विराजे शकर्राचार्य जी चौसर खेल के प्रेमी थे और उन्होंने ज्योतिष्पीठ की गद्दी को बाजी पर लगा दिया था। खेल में पराजित हो जाने के बाद उन्हें रावल को ज्योतिष्पीठ और बद्रीनाथश् मन्दिर सौंपकर गुजरात के लिये पलायन करना पडा था।
ब्रह्मचारी जी ने आगे बताया कि ज्योतिष्पीठ के १६५ वर्षो तक खाली रहने का कारण तत्कालीन भौगोलिक परिस्थितियों और नेपाल का भारत पर आक्रमण था। रावल शकराचार्य जी का ही ब्रह्मचारी था। इस इतिहास को गढवाल के प्रामाणित इतिहास में भी देखा जा सकता है। जब बद्रीनाथ मन्दिर कापट बन्द होता है। और उनका श्रीविग्रह जोशीमठ आता है। तब उनके साथ ही शंकराचार्य जी की गद्दी पालकी में आती है और जोशीमठ के नरसिंह मन्दिर प्रांगण में यथास्थान विराजित होती है। रावल गद्दी को प्राणाम करता है और अपने नियत अलग आसन पर बैठता है।
श्री ब्रह्मचारी जी ने स्पष्ट किया है कि ज्योतिष्पीठ पर वर्तमान में पूज्यवाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा शारदापीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज विधिवत् अभिषेक होकर सन् १९७३ से ही विराजमान है और निरन्तर धर्म प्रचार का कार्य कर रहे है।
जहंा तक स्वामी वासुदेवानन्द जी के जूना अखाडे की पेशवाई में सम्मिलित होने का प्रश्न है वह स्वयं बताता है कि वे ज्योतिष्पीठ के शकंराचार्य नहीं है। यदि वे ज्योतिष्पीठ के शकराचार्य होते तो किसी अखाडे के साथ पेशवाई करने के स्थान पर स्वयं उनका पेशवाई जुलूस होता जिसका स्वागत अखाडे करते। जूना अखाडा अपने आचार्य महामण्डलेश्वर को सबसे पूजनीय मानता है। और स्वामी वासुदेवानन्द जी को उनके पीछे चलाता है। यदि स्वामी वासुदेवानन्द जी शंकराचार्य है तो जूना अखाडे के आचार्य महामण्डलेश्वर के पीछे चलकर वे स्वयं कौन सी महिमा गरिमा पा रहे है। यही प्रश्न है। 

अब बरतनी ही होगी सख्ती


पहले दिल्ली हाईकोर्ट और फिर सप्ताह बीतते ही आगरा के एक निजी अस्पताल में विस्फोट.. चीख-पुकार, अफरा-तफरी, लाशें, सांत्वना और कुछ घिसी-पिटी घोषणाएं। दिल्ली हाईकोर्ट में इसके पहले इसी साल मई में भी विस्फोट हुआ था। बाद में यानी 7 सितंबर को हुए विस्फोट के बारे में भी अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे आम जनता में यह भरोसा बने कि वह सुरक्षित है और आगे ऐसा कुछ नहीं होगा। अब तक जो हुआ है, वह है सिर्फ बयानबाजी। वह भी घिसी-पिटी.. कुछ नया नहीं। अरसे से दिए जा रहे बयान एक बार फिर दोहरा दिए गए। क्या इसी के दम पर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था चलेगी? जनता इन थोथे बयानों, जुबानी चिंताओं और झूठे आश्वासनों के भरोसे कितने दिन जिंदा रह लेगी? एसपीजी और जेड श्रेणी के सुरक्षा घेरों में चलने वाले लोग इसका अंदाजा नहीं लगा सकते। रोजी-रोटी की अपनी मजबूरियों के चलते रोज दुकान-दफ्तर आते-जाते लोगों को देखकर यह जुमला चलाया जा सकता है कि जिंदगी फिर पटरी पर आ गई, लेकिन जिंदगी कितनी पटरी पर होती है और कितनी पटरी से नीचे यह आम लोगों और उनके परिजनों से पूछ कर देखें तो पता चले।
आए दिन होते विस्फोटों का नतीजा यह हुआ है कि देश भर में कहीं भी लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। घर से बाहर निकलने की हिम्मत तो आम आदमी को नहीं ही होती है, घर के भीतर भी वह डरा-सहमा हुआ ही रह रहा है। जहां तक बाहर निकलने और अपने कामकाज में लगे होने की बात है, उसका एक ही कारण है और वह यह कि घर में बैठे रह कर कोई पेट नहीं भर सकता है। जीवन चलाना है तो बाहर निकलना ही होगा। यह समझना कठिन है कि हम कैसी व्यवस्था में जी रहे हैं। आखिर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? आतंकवादी देश में घुसने और पनपने न पाएं तथा वे अपने खतरनाक इरादों को अंजाम न देने पाएं, यह सुनिश्चित करना किसका काम है? गुंडे-बदमाश और माफिया देश में अपनी मनमानी न चलाने पाएं, यह तय करना किसकी जिम्मेदारी है? क्या इसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं? अगर यह काम आम जनता को ही करना है तो फिर सरकार की जरूरत क्या है? क्यों हम शासन-प्रशासन के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों रुपये रोज खर्च कर रहे हैं? ऐसी नीतियां किस काम की हैं जो जनता को शांतिपूर्ण और सुरक्षित जीवन की गारंटी भी नहीं दे सकती हैं?
ये सवाल हमारे नहीं, आम जनता के हैं। बाजार, धर्मस्थल, ट्रेन-बस .. कहीं भी, जहां दस लोग जुटे हों और कोई चर्चा चल पड़े, तो इन दिनों यही सवाल उछलते नजर आ रहे हैं। लोग इसके लिए साफतौर पर सरकार की ढुलमुल नीतियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। पिछले तीन दशकों पर नजर डालें तो अब तक की हमारी सभी सरकारें आतंकवादियों और उन्हें मदद देने वाले देशों के प्रति किसी भी तरह की सख्ती बरतने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार सख्ती बरतना नहीं जानती है। उसे सख्ती बरतना बहुत अच्छी तरह आता है, लेकिन सिर्फ निहत्थे, निर्दोष और कमजोर लोगों पर। जिनके साथ अत्यंत कड़ा बर्ताव किया जाना चाहिए, उनके साथ हमारी सरकार जरा भी कड़ाई नहीं बरत पाती है। उनके लिए मानवाधिकार के सवाल उठा दिए जाते हैं और उन तमाम निर्दोषों का मानवाधिकार जाने क्यों मुल्तवी कर कर दिया जाता है, जिनका जीवन वे पहले ही बेवजह छीन चुके होते हैं। हमारे यहां शासन तंत्र के लिजलिजेपन का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा?
बुनियादी सवाल तो यह है कि हमारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो भी तो कैसे? न तो देश में मौजूद संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर नजर रखने की कोई पुख्ता व्यवस्था है और न ही दूसरे देशों से आए लोगों की समय से वापसी सुनिश्चित करने की। कोई यहां आकर कितने भी दिन तक बने रह सकता है। जिन देशों के लोगों के रंग-रूप हमसे नहीं मिलते उनके भी ठहरने की समय सीमा सुनिश्चित करने का कोई प्रभावी उपाय हमारे यहां उपयोग में नहीं लाया जाता। वे खुद समय से चले जाते हैं और कोई बेजा हरकत नहीं करते, तो यह उनकी शराफत है। हमें सबसे अधिक खतरा उन्हीं देशों के लोगों से है, जिनके नागरिकों के रंग-रूप बिलकुल हमारे ही जैसे हैं। भला उन पर हम कैसे रोक लगाएंगे। न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बावजूद अवैध रूप से यहां रह रहे बांग्लादेशियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की कोई निश्चित व्यवस्था आज तक नहीं बनाई जा सकी है। भारत के अधिकतर छोटे-बड़े शहरों में वे मौजूद हैं और कई तरह से हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा भी बने हुए हैं।
क्या यह सिर्फ पुलिस और प्रशासन की खामी है? आम जनता अब इसे पुलिस या प्रशासन की लापरवाही या नाकामी मानने के लिए कतई तैयार नहीं है। आम देशवासी यह मानता है कि राजनेता बांग्लादेशियों को वोट बैंक के रूप में देखते हैं। वे किसी भी तरह अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए इन्हें बचाते हैं। वे चाहते ही नहीं कि इन्हें वापस भेजा जाए, क्योंकि इनसे उन्हें थोक में वोट मिल जाते हैं, सिर्फ इस शर्त पर कि उन्हें यहां किसी तरह रहने दिया जाए। ठीक यही बात पाकिस्तान से आकर अवैध रूप से यहां रह रहे लोगों के मामले में भी है। लोगों के ऐसा मानने के पीछे पर्याप्त वजहें हैं। हर शख्स यह देख रहा है कि वास्तविक भारतीय नागरिकों की किसी समस्या के समाधान में राजनेताओं की कोई रुचि नहीं रह गई है। महंगाई, बेकारी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए उन्हें जादू की छड़ी चाहिए, जो उनके पास नहीं है। आतंकवाद के दोषियों को वे छोड़ेंगे नहीं, लेकिन पकड़ने में कोई रुचि भी नहीं लेंगे। आखिर मतलब क्या रह गया है सरकार के होने का?
सच तो यह है कि आतंकवाद समेत सभी समस्याओं पर काबू पाने के लिए सिर्फ दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है और हम इस मामले में भयावह अभाव के दौर से गुजर रहे हैं। हम देशों तो क्या, आतंकवादियों के सामने घुटने टेक देते हैं। सभी तरह के साधन और सुविधाएं तथा योग्य एवं सक्षम तंत्र के होते हुए भी आतंकवाद के खिलाफ एक समग्र अभियान चला पाने में इंदिरा गांधी के बाद हमारी सरकारें विफल रही हैं। हमें मालूम है कि हमारे यहां आतंकवाद का अधिकांश पाकिस्तान से प्रायोजित है, इसके बावजूद हमारे राजनेताओं ने न तो उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गोलबंदी में कोई खास दिलचस्पी दिखाई और न उसे कोई संदेश ही दिया। पिछले करीब बीस वषरें से हम उसके साथ बातचीत के नाटक में अपनी भूमिका निभा रहे हैं और नतीजा शून्य है। इससे कुछ होने वाला नहीं है। कुछ हो, इसके लिए अनिवार्य है कि वास्तव में सख्ती बरती जाए। आतंक का खेल खेलने वालों को जब तक मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया जाएगा, मौत का यह तांडव रोक पाना संभव नहीं है।
[निशिकान्त ठाकुर: लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं] 

रामलला की मूर्ति नहीं हटाई जाएगी


लखनऊ। अयोध्या में विवादित जमीन के स्वामित्व संबंधी मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुरुवार को बहुमत से फैसला दिया कि अयोध्या में विवादित स्थल को तीन हिस्सों में सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला पक्ष को बराबर बांटा जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का दीवानी दावा खारिज करते हुए कहा कि विवादित स्थल पर रामलला की पूजा जारी रहेगी। तीनों न्यायमूर्तियों एसयू खान, सुधीर अग्रवाल और डीवी शर्मा ने दिए अलग-अलग फैसले दिए, लेकिन पूजा जारी रखने पर तीनों एकमत का एक है। वकीलों ने यह जानकारी दी।
न्यायमूर्ति डीवी शर्मा ने मालिकाना हक संबंधी मामले का फैसला हिंदुओं के हक में सुनाया। राम लला पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील केएन भट्ट ने यह जानकारी दी। वकीलों रवि शंकर प्रसाद और केएन भट्ट ने दावा किया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर तीन महीने तक यथास्थिति बहाल रखी जाएगी। वकीलों के अनुसार न्यायमूर्ति एसयू खान ने व्यवस्था दी कि विवादित भूमि दोनों समुदायों की है।
अयोध्या विवाद संबंधी इतिहास और घटनाक्रम:-
अयोध्या में विवादित भूमि का मुद्दा दशकों से एक भावनात्मक मुद्दा बना हुआ है और इसे लेकर विभिन्न हिंदू एवं मुस्लिम संगठनों ने तमाम कानूनी वाद दायर कर रखे हैं। अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लेकर इतिहास एवं घटनाक्रम इस प्रकार है।
-1528: मुगल बादशाह बाबर ने उस भूमि पर एक मस्जिद बनवाई जिसके बारे हिंदुओं का दावा है कि वह भगवान राम की जन्मभूमि है और वहां पहले एक मंदिर था।
-1853: विवादित भूमि पर सांप्रदायिक हिंसा संबंधी घटनाओं का दस्तावेजों में दर्ज पहला प्रमाण।
-1859: ब्रिटिश अधिकारियों ने एक बाड़ बनाकर पूजास्थलों को अलग-अलग किया। अंदरुनी हिस्सा मुस्लिमों को दिया गया और बाहरी हिस्सा हिंदुओं को।
-1885: महंत रघुवीर दास ने एक याचिका दायर कर रामचबूतरे पर छतरी बनवाने की अनुमति मांगी, लेकिन एक साल बाद फैजाबाद की जिला अदालत ने अनुरोध खारिज कर दिया।
-1949: मस्जिद के भीतर भगवान राम की प्रतिमाओं का प्राकट्य। मुस्लिमों का दावा कि हिंदुओं ने प्रतिमाएं भीतर रखवाई। मुस्लिमों का विरोध। दोनों पक्षों ने दीवानी याचिकाएं दायर की। सरकार ने परिसर को विवादित क्षेत्र घोषित किया और द्वार बंद कर दिए।
-18 जनवरी 1950: मालिकाना हक के बारे में पहला वाद गोपाल सिंह विशारद ने दायर किया। उन्होंने मांग की कि जन्मभूमि में स्थापित प्रतिमाओं की पूजा का अधिकार दिया जाए। अदालत ने प्रतिमाओं को हटाने पर रोक लगाई और पूजा जारी रखने की अनुमति दी।
-24 अपै्रल 1950: उप्र राज्य ने लगाई रोक। रोक के खिलाफ अपील।
-1950: रामचन्द्र परमहंस ने एक अन्य वाद दायर किया लेकिन बाद में वापस ले लिया।
-1959: निर्मोही अखाड़ा भी विवाद में शामिल हो गया तथा तीसरा वाद दायर किया। उसने विवादित भूमि पर स्वामित्व का दावा करते हुए कहा कि अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर हटाया जाए। उसने खुद को उस स्थल का संरक्षक बताया जहां माना जाता है कि भगवान राम का जन्म हुआ था।
-18 दिसंबर 1961: उप्र सुन्नी सेन्ट्रल बोर्ड आफ वक्फ भी विवाद में शामिल हुआ। उसने मस्जिद और आसपास की भूमि पर अपने स्वामित्व का दावा किया।
-1986: जिला न्यायाधीश ने हरिशंकर दुबे की याचिका पर मस्जिद के फाटक खोलने और 'दर्शन' की अनुमति प्रदान की। मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की।
-1989: विहिप के उपाध्यक्ष देवकी नंदन अग्रवाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में एक ताजा याचिका दायर करते हुए मालिकाना हक और स्वामित्व भगवान राम के नाम पर घोषित करने का अनुरोध किया।
-23 अक्टूबर 1989: फैजाबाद में विचाराधीन सभी चारों वादों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की विशेष पीठ में स्थानांतरित किया गया।
-1989: विहिप ने विवादित मस्जिद के समीप की भूमि पर राममंदिर का शिलान्यास किया।
-1990: विहिप के स्वयंसेवकों ने मस्जिद को आंशिक तौर पर क्षतिग्रस्त किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बातचीत के जरिए विवाद का हल निकालने का प्रयास किया।
-छह दिसंबर 1992: विवादित मस्जिद को विहिप, शिवसेना और भाजपा के समर्थन में हिंदू स्वयंसेवकों ने ढहाया। इसके चलते देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिनमें 2000 से अधिक लोगों की जान गई।
-16 दिसंबर 1992: विवादित ढांचे को ढहाए जाने की जांच के लिए न्यायमूर्ति लिब्रहान आयोग का गठन। छह माह के भीतर जांच खत्म करने को कहा गया।
-जुलाई 1996: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी दीवानी वादों पर एकसाथ सुनवाई करवाने को कहा।
-2002: हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई कर यह पता लगाने को कहा कि क्या विवादित भूमि के नीचे कोई मंदिर था।
-अपै्रल 2002: हाईकोर्ट के तीन न्यायाधीशों ने सुनवाई शुरू की।
-जनवरी 2003: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अदालत के आदेश पर खुदाई शुरू की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वहां भगवान राम का मंदिर था।
-अगस्त 2003: सर्वेक्षण में कहा गया कि मस्जिद के नीचे मंदिर होने के प्रमाण। मुस्लिमों ने निष्कर्षो से मतभेद जताया।
-जुलाई 2005: संदिग्ध इस्लामी आतंकी ने विवादित स्थल पर हमला किया। सुरक्षा बलों ने पांच आदमियों को मारा।
-जून 2009: लिब्रहान आयोग ने अपनी जांच शुरू करने के 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस बीच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया।
-26 जुलाई 2010: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वादों पर अपना फैसला सुरक्षित रखा। फैसला सुनाने की तारीख 24 सितंबर तय की।
-17 सितंबर 2010: हाईकोर्ट ने एक पक्ष रमेश चंद्र त्रिपाठी के अनुरोध को खारिज करते हुए अपना फैसला सुनाने की तिथि टालने से किया इनकार।
-21 सितंबर 2010: त्रिपाठी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर और न्यायमूर्ति एके पटनायक की पीठ ने मामले पर सुनवाई से किया इनकार। मामले को अन्य पीठ के पास भेजा गया।
-23 सितंबर 2010: याचिका पर सुनवाई किए जाने के मामले में न्यायमूर्ति आर वी रवींद्रन और न्यायमूर्ति एच एल गोखले ने दी अलग-अलग राय। कोर्ट ने पक्षों को नोटिस जारी किए।
-28 सितंबर 2010: सुप्रीम कोर्ट का हाईकोर्ट को फैसला सुनाने की तिथि टालने का निर्देश देने से इकार। हाईकोर्ट ने फैसला सुनाने की तिथि 30 सितंबर तय की।
-30 सितंबर 2010 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायाधीशों ने फैसला सुनाया। 

Monday, 19 September 2011

मोदी विरोध की दुकानदारी


दोहरे चरित्र रखने वाले व अति हिन्दू विरोध से लथपथ देश के बुद्धीजीवियों व गैर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक संवर्ग निश्चित तौर पर मुस्लिम आबादी के शुभचिंतक नहीं, उनके वोट बैंक पर कुदृष्टि डाले गिद्ध है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की असली शक्ति हैं। नरेन्द्र मोदी का जितना अधिक विरोध और उनके खिलाफ राजनीतिक/न्यायिक प्रक्रियाएं चलती हैं उतना ही गुजरात का जनमानस नरेन्द्र मोदी के साथ निकट चला आता है।
गुजरात की जनता की अस्मिता के साथ गोधरा कांड से ही खिलवाड़ करने की राजनीतिक-सामाजिक प्रक्रिया चलती रही है। गुजरात दंगा निश्चित तौर पर एक गैरजरूरी प्रक्रिया थी। लेकिन यह क्यों भूला दिया जाता है कि गोधरा कांड के बाद तथाकथित दोहरे चरित्र रखने वाले और अति हिन्दू विरोध से लथपथ बुद्धीजीवियों-राजनीतिक पार्टियों ने सांप्रदायिक मानसिकता की आग लगायी थी। गोधरा कंाड के दोषियों को कानून का पाठ पढाने की जगह विवेचना-आलोचना का मकड़जाल हिन्दू विरोध पर आधारित थी। गुजराती अस्मिता गोधरा कांड के पूर्व से आहत थी और कई ऐसी प्रक्रियाएं थी जो सीधेतौर बहुसंख्यक गुजराती अस्मिता को कूचल रहीं थी। गुजरात दंगे के बाद नरेन्द्र मोदी ने विकास-उन्नति के रास्ते चुनने की काबलियत दिखायी। राजनीतिक/एनजीओ गठजोड़ से उपजी चुनौतियों से दूसरा कोई भी राजनीतिज्ञ विचलित होता और उसकी सत्ता विध्वंस को भी प्राप्त होती पर नरेन्द्र मोदी ने उन चुनौतियों का न केवल दृढ़ता के साथ सामना किया बल्कि भेदभाव रहित शासन व्यवस्था कायम की है। मोदी के विकास को विरोधी शक्तियां ही नहीं बल्कि मुस्लिम आबादी भी स्वीकार करती है और तारीफ करती है। विकास की जो श्रृंखलाएं बनती है उन श्रृंखलाओं का लाभ सभी संवर्ग को मिलता है। राजनीतिक तकरार तो चलती रहेगी पर इस राजनीतिक तकरार का मोहरा सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम आबादी ही बनती हैं। गुजरात में ऐसी राजनीतिक-सामाजिक वातावरण की जरूरत है जिसमें सभी आबादी की श्रृंखलाओं में परस्पर सहयोग व सदभावना की उम्मीद बनती है।
मोदी का अतिविरोध करने वालों का दोहरा चरित्र कितना घिनौना है? कितना राष्ट्र की अस्मिता को धूल धूसरित करती है? इसका भी एक उदाहरण देख लीजिये। इस उदाहरण को देखने के लिए गुजरात दंगे से बाहर निकल कर देखना होगा। कश्मीरी पंडितों के अनुपात में गुजरात में कितने मुस्लिम समुदाय की आबादी आहत व प्रताड़ित हुई है? दस लाख कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि को छोड़कर भागने के लिए विवश किया गया। हजारों लोगों को आतंकवादियों ने मौत की नींद सुला दी। तर्क यही था कि कश्मीरी पंडित हिन्दू हैं, इसलिए इन्हें या तो इस्लाम स्वीकार करना होगा या फिर गोली-बम का शिकार होना होगा। आज कश्मीरी पंडित अपनी मातृभूमि से बेदखल होकर ठोकरे खा रहे हैं पर इनकी चिंता बुद्धीजीवियों को है? हुर्रियत के सभी नेता किसी न किसी काल खंड में आतंकवादी रहे है और वे कश्मीरी पंडितों के लहू पीने वाले पिशाच है। इन कश्मीरी पंडितो के रक्तपिशाचुओं के सम्मान में यही बुद्धीजीवी खड़ा रहते हैं। हुर्रियत के नेताओं को दिल्ली बुलाकार सेमिनारों में सम्मानित किया जाता है व राष्ट की संप्रभुता के साथ खिलवाड करने की अनवतरत प्रक्रिया चलती है। क्या हुर्रियत के नेता मोदी से कम विषैला हैं? क्या हुर्रियत के नेता कश्मीरी पंडितों के रक्तपिशाचु नहीं हैं। हिन्दू और राष्ट के हितो के साथ खिलवाड़ करने पर बुद्धीजीवियों को आर्थिक व वैश्विक लाभ-सम्मान मिलता है। आईएसआई ने देश के अंदर राष्ट्रविरोधी बुद्धिजीवियों की लम्बी कतार खड़ी है। ये बुद्धिजीवी आईएसआई के इसारों पर नाचते हैं। अमेरिका में आईएसआई एजेंट फई से पैसा लेने वाले और उसके निमंत्रण पर अमेरिका जाकर भारत विरोध की कूटनीति चलाने वाले बुद्धीजीवियों की पोल खुल गयी है।
तथाकथित बुद्धीजीवी संवर्ग और मोदी विरोधी राजनीतिक शक्तियां क्या मुस्लिम आबादी की हितैषी है? विश्लेषण का एक आधार भी यह होना चाहिए? तथाकथित बुद्धीजीवियो को अपनी दुकान चलानी है जबकि मोदी विरोधी राजनीतिक धारा को मुस्लिम वोट बैंक की चिंता है। इन दोनों धाराओं को यह मालूम है कि उनकी लाभार्थी होने की एकमात्र शर्त अति हिन्दू विरोध और मोदी के डर को कायम रखना है। इन बुद्धीजीवियों और राजनीतिक संवर्ग उस समय मुंह पर पट्टी लगाये क्यों बैठे थे जब गुजरात धधक रहा था। पूर्व सांसद जाफरी ने अपनी जान बचाने के लिए सोनिया गांधी से लेकर कांग्रेस के कई नेताओं को टेलीफोन किये थे। लेकिन जाफरी की किसी ने भी मदद नहीं की। जाफरी की जान बचाने के लिए आगे नहीं आने वाली कांग्रेस आज मुस्लिम आबादी का हमदर्द होने का नाटक रच रही है। यह भी बात होती है कि मुस्लिम आबादी आज पिछड़ी हुई है और उसके साथ राजनीतिक बेईमानी हुई है। यह बात तो सच्ची है पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या मोदी जिम्मेदार है? कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम आबादी को एक वोट बैंक के तौर पर देखा। वोट लेकर मुस्लिम आबादी को हाशिये पर ढकलने जैसी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी गयी। हिन्दूवाद का विरोध-मोदी का विरोध ही वह शक्ति है जिससे कांग्रेस को सत्ता संग्रहित करने का अवसर मिलता है। कांग्रेस की इस राह पर वामपंथी सहित पिछड़ी व दलित राजनीतिक पार्टियां भी चलती हैं।
गुजरात की बहुसंख्यक अस्मिता हमेशा से तथाकथित बुद्धजीवियों और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों की तुष्टीकरण से कुचली गयी हैं। गुजरात ही नहीं बल्कि देश की बहुसंख्यक अस्मिता इस बात को लेकर व्यथित रहती है कि उन्हे तुष्टीकरण के परिणामों का शिकार तो बनाया ही जाता है इसके अलावा उन पर लांक्षणा की प्रक्रिया भी चलती रहती है। बहुसंख्यक अस्मिता शांति और सदभाव का समर्थक हैं। इसलिए बहुसंख्यक मान्यताओं पर खिल्ली उड़ाने वाली प्रक्रिया बेधड़क चलती रहती है। कभी राम की तो कभी कृष्ण पर कीचड़ उछाली जाती है। पर कभी गैर हिन्दू मान्यताओं पर तथाकथित बुद्धीजीवी और राजनीतिक श्रृंखलाएं खिल्ली उड़ा सकती है। कभी नहीं। आनन-फानन में इनकी हेकड़ी ग्राह हो जायेगी? गोधरा-गुजरात के पहले एक खास संवर्ग की गुंडागर्दी चरम पर थी। इस गुंडागर्दी की मानसिकताएं वैसी ही थी जैसी कि इस्लामिक आतंकवादी श्रृंखलाओं की रही है।
उपवास और सदभावना की नीति का अतिविरोध भी एक तरह से नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक शक्ति का ही परिचायक है। नरेन्द्र मोदी  लगातार तीन बार से निर्वाचित हो रहे हैं। कांग्रेस और सभी विरोधी संवर्गों की पूरी की पूरी नीति धरी की धरी रह जाती हैं। नरेन्द्र मोदी की लगातार जीत ने साबित कर दिया है कि वे गुजरात की बहुसंख्यक अस्मिता के प्रतीक हैं। प्रशासनिक क्षमता का उन्होंने बेमिसाल उदाहरण दिया है। वीजा देने से इनकार करने वाला अमेरिका भी अब नरेन्द्र मोदी का प्रशंसक है। इसलिए कि नरेन्द्र मोदी ने विकास की प्रक्रिया चलायी। लगातार विरोधों के बाद भी विकास की सर्वश्रेष्ठ लौ जलाने की उपलब्धि ऐसी है जो मोदी को विकास मसीहा की पदवि देती है। विकास कार्यो में उन्होंने कहीं से भी न तो अन्याय किया और न ही उन्होंने पक्षपात किया। मुस्लिम आबादी आज खुद मोदी के विकास का गुणगान करती है। गुजरात के मुस्लिम सवर्ग के चिंतन में गुणात्मक बदलाव आया है। अब वे यह समझ गये हैं कि राजनीतिक तकरार या हिंसा की बात करने से लाभ नही होने वाला है। शांति-सदभाव से ही उन्नति की राह आसान हो सकती है। अलगाव और वैमनस्यता को हवा देने वाले राजनीतिक दल और बुद्धीजीवी मुस्लिम आबादी की भलाई नहीं चाहते हैं। नरेन्द्र मोदी न केवल गुजरात की बहुंसख्यक अस्मिता का प्रतीक है बल्कि देश की बहुसंख्यक आबादी के बीच भी उनकी साख और विश्वसनीयता सर्वश्रेष्ठता की श्रेणी में खड़ी है। भाजपा में उन्हें प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप देखा जाने लगा है। क्या नरेन्द्र मोदी भाजपा का नेतृत्व करने की शक्ति हासिल कर सकते हैं और भाजपा को फिर से केन्द्र की सत्ता पर बैठा सकते हैं? भविष्य की राजनीति में नरेन्द्र मोदी की संभावनाएं सर्वश्रेष्ठ है। 

विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी

जम्मू। आतंकवाद के चलते अपने देश में ही पिछले 21 सालों से कश्मीरी पंडित विस्थापितों का जीवन व्यतीत कर रहे है। कश्मीरी पंडित विस्थापित संगठनों की माने तो विस्थापित होने के बाद कश्मीरी पंडित विस्थापित देश के विभिन्न हिस्सों में विस्थापन की जिंदगी व्यतीत कर रहे है। एपेक्स कमेटी में प्रस्ताव रखा गया कि जो विस्‍थापित को अपना मकान बनाने के लिए 20 लाख रुपये दिए जाएंगे। इनकी कुल आबादी मौजूदा समय में करीब पांच लाख बताई जा रही है। राजस्वमंत्री रमन भल्ला का कहना है कि सरकार विस्थापित पंडितों की वापसी को लेकर प्रतिबद्घ है। सम्मानपूर्वक वापसी को लेकर सरकार ने मसौदा भी तैयार किया है। केंद्र सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी स्वयं विस्थापितों की वापसी की योजना की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने विस्थापित बेरोजगारों को सरकारी रोजगार भी दिया है।
कश्मीरी पंडित विस्थापितों के संगठन पनुन कश्मीर के प्रधान अश्विनी कुमार चुरंगू का कहना है कि वर्ष 1989-90 में इस्लामिक आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडित विस्थापितों को निशाना बनाना शुरू किया। 13 सितंबर 1989 को कश्मीरी पंडितों के प्रमुख नेता टीका लाल टपलू को उनके घर के बाहर ही गोलियों से छननी कर दिया गया। जज नीलकांथ गंजू और प्रेम नाथ भट्ट का भी यही हश्र हुआ। कुल मिलाकर एक हजार कश्मीरी पंडितों को मार दिया गया। इसके बाद कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर आना पड़ा। उनका कहना है कि घाटी में हालात अब भी ठीक नही है। कश्मीरी पंडितों का मसला राजनीतिक मसला है। जब तक उन्हें घाटी में अलग होमलैंड और केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा नही दिया जाता तक तक घाटी लौटना संभव नही है।
सरकार रोजगार को वापिस लौटने के साथ जोड़कर देख रही है जोकि सही नही है 

Thursday, 8 September 2011



कश्मीरी हिंदुओं का सफाया - ऑपरेशन 



अगले सप्ताह 19 जनवरी को कश्मीरी हिंदुओं के घाटी से निष्कासन के दो दशक पूरे हो जाएंगे। यह तिथि किसी उत्सव की नहीं, मरते राष्ट्र की वेदनाजनक दुर्दशा की द्योतक है। अपने ही देश में नागरिकों को शरणार्थी बनना पड़ा है, इससे बढ़कर धिक्कारयोग्य तथ्य और क्या हो सकता है? बीस साल पहले घाटी में अचानक 19 जनवरी के दिन ये ऐलान होने शुरू हुए थे। इनमें कहा गया था कि ऐ पंडितों, तुम अपनी स्त्रियों को छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ। इससे पहले लगातार कश्मीरी हिंदुओं की हत्याओं का दर्दनाक सिलसिला शुरू हो चला था। भाजपा नेता टीकालाल थप्लू, प्रसिद्ध कवि सर्वानंद और उनके बेटे की आंखें निकालकर हत्या की गई। एचएमटी के जनरल मैनेजर खेड़ा, कश्मीर विश्वविद्यालय के वाइस चासलर मुशीरुल हक और उनके सचिव की हत्याओं का दौर चल पड़ा था। जो भी भारत के साथ है, भारत के प्रति देशभक्ति दिखाता है, उसे बर्बरतापूर्वक मार डालने के पागलपन का दौर शुरू हो गया था। कश्मीरी हिंदू महिलाओं से दुष्कर्म के बाद उनकी हत्याओं का सिलसिला जब रुका नहीं तो 19 जनवरी के दहशतभरे ऐलान के बाद हिंदुओं का सामूहिक पलायन शुरू हुआ। यह वह वक्त था जब जगमोहन ने राज्य के गवर्नर पद की कमान संभाली ही थी कि उनके विरोध में फारुक ने इस्तीफा दे दिया, फलत: राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। राजनीतिक कारणों से ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया गया मानो दिल्ली का विदेशी शासन कश्मीर पर थोपा जा रहा है और कश्मीरी हिंदू दिल्ली के हिंदू राज के एजेंट हैं। जेकेएलएफ, हिजबुल मुजाहिदीन और तमाम मुस्लिम समूह एकजुट होकर हिंदू पंडितों के खिलाफ विषवमन करने लगे। ऐसी स्थिति में घाटी से हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा।
घाटी के हिंदुओं पर यह कहर पहली बार नहीं टूटा था। 14वीं सदी में सिकंदर के समय, फिर औरंगजेब के राज में और उसके बाद 18वीं सदी में अफगानों के बर्बर राज में हिंदुओं को घाटी से निकलना पड़ा था। उनकी रक्षा में गुरु तेग बहादुर साहेब और तदुपरात महाराजा रणजीत सिंह खड़े हुए थे, तब जाकर हिंदू वापस लौट पाए थे। इस बार उनकी रक्षा के लिए कोई खड़ा नहीं होता दिखा, सिवाय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनसे जुड़े संगठनों के। जिन मुस्लिम जिहादियों ने उनको कश्मीर छोड़ कर पलायन के लिए मजबूर किया वे बाहरी नस्ल के नहीं, बल्कि वे लोग थे जिनके पूर्वज, भाषा, रंग-रूप, खान-पान और पहनावा सब कश्मीरी हिंदुओं जैसा ही था। केवल मजहब बदलने के कारण वे अपने ही रक्तबंधुओं के शत्रु क्यों हो गए, इस प्रश्न का उत्तर खोजना चाहिए। आखिर एक नस्ल, एक खून, एक बिरादरी होने के बावजूद केवल ईश्वर की उपासना के तरीके में फर्क ने यह दुश्मनी क्यों पैदा की? इसके अलावा एक और तथ्य यह है कि कश्मीर भारत का एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य है और वहा ही अल्पसंख्यक हिंदुओं को भारी अत्याचार तथा अपमानजनक निष्कासन का शिकार होना पड़ा। क्या मुस्लिम बहुल राज्य का अर्थ यह है कि वहा अल्पसंख्यकों के लिए कोई अधिकार नहीं? भारत के अन्य हिंदू बहुल राज्यों में कई बार मुस्लिम मुख्यमंत्री हुए हैं, परंतु क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक दिन कश्मीर में भी कोई हिंदू मुख्यमंत्री बन सकेगा? बल्कि हुआ उल्टा ही है। मुस्लिम बहुल कश्मीर अपने अन्य हिस्सों लद्दाख तथा जम्मू के साथ योजनाओं और विकास के कार्यक्रमों में भारी सांप्रदायिक भेदभाव करता है। पिछले दिनों श्री अमरनाथ यात्रा के लिए श्रीनगर के सुल्तानों ने एक इंच जमीन देने से भी मना कर दिया था, फलस्वरूप राज्य के इतिहास का सबसे जोरदार आंदोलन हुआ और सरकार को अपने शब्द वापस लेने पडे़। जम्मू का क्षेत्रफल 26293 वर्ग किलोमीटर है, जबकि घाटी का मात्र 15948 वर्ग किलोमीटर। जम्मू राज्य का 75 प्रतिशत राजस्व उगाहता है, कश्मीर घाटी सिर्फ 20 प्रतिशत। जम्मू में मतदाताओं की संख्या है 3059986 और घाटी में 2883950, फिर भी विधानसभा में जम्मू की 37 सीटें हैं, जबकि घाटी की 46। इस प्रकार श्रीनगर भारत में ही अभारत जैसा दृश्य उपस्थित करता है। उस पर कश्मीर को और अधिक स्वायत्तता दिए जाने की सिफारिश करने वाली सगीर अहमद रिपोर्ट ने राज्य के भारतभक्तों के घाव पर नमक ही छिड़का है। यदि 1947 में भारत द्विराष्ट्र सिद्धात का शिकार होकर मातृभूमि के दो टुकड़े करवा बैठा था तो सगीर अहमद रिपोर्ट तीन राष्ट्रों के सिद्धात का प्रतिपादन करती है। यह रिपोर्ट डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे देशभक्तों के बलिदान को निष्प्रभावी करने का षड्यंत्र है। इस रिपोर्ट का जम्मू और लद्दाख में भारी विरोध हो रहा है, क्योंकि न केवल इस रिपोर्ट के क्रियान्वयन के बाद जम्मू-कश्मीर का शेष भारत के साथ बचा-खुचा संबंध भी समाप्त हो जाएगा, बल्कि हिंदुओं और बौद्ध नागरिकों के साथ भयंकर भेदभाव के द्वार और खुल जाएंगे। फिर हिंदू कश्मीरियों के वापस घर जाने की सभी संभावनाएं सदा के लिए समाप्त हो जाएंगी।
इस रिपोर्ट में केवल मुस्लिमों को केंद्र में रखकर समाधान के उपाए सुझाए गए हैं, जिसका अर्थ होगा पकिस्तान के कब्जे वाले गुलाम कश्मीर की वर्तमान स्थिति स्वीकार कर लेना और संसद के उस प्रस्ताव को दफन कर देना, जिसमें पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने की कसम खाई गई थी। वीर सैनिकों का बलिदान, कश्मीरी देशभक्तों द्वारा सही गई भीषण यातनाएं, हजारों करोड़ों के राजस्व के व्यय के बाद समाधान यह निकाला गया तो उसके परिणामस्वरूप भारत का नक्शा ही बदल जाएगा। छोटे मन के लोग विराट जिम्मेदारियों का बोझ नहीं उठा सकते। क्या अपने ही देश में शरणार्थी बने भारतीयों की पुन: ससम्मान घर वापसी के लिए मीडिया और समस्त पार्टियों के नेता एकजुट होकर अभियान नहीं चला सकते? क्या यह सामान्य देशभक्ति का तकाजा नहीं होना चाहिए?

पहले कुछ सौ सालों से मतांतरण के कारण कश्मीरी हिंदुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है। अनेकानेक कारणों से अधिकांश कश्मीरी हिंदू इस्लाम मजहब में दीक्षित हो गए। लेकिन फिर भी कश्मीर घाटी में लगभग 4 लाख हिंदू बचे रहे जिन्होंने तमाम प्रलोभनों को ठुकराते हुए और शासकीय अत्याचारों को सहते हुए भी अपने पंथ अथवा मजहब का त्याग नहीं किया। ये कश्मीरी हिंदू इस्लामी कट्टरवारी ताकतों की किरकिरी बने हुए थे क्योंकि इस्लामी शासन तभी तक सहिष्णु है जब तक राज्य में इस्लाम पंथी अल्पमत में हैं। लेकिन जैसे ही किसी क्षेत्र में इस्लाम पंथी निर्णायक बहुमत में आ जाते हैं वहां वे अन्य मतावलंबियों को या तो दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखते हैं या फिर उन्हें इस्लाम में दीक्षित करने का प्रयास करते हैं। इन दोनों प्रयासों में यदि वे असफल हो जाते हैं। तो वे उनको डराकर वहां से भगाने का प्रयास करते हैं। कश्मीर घाटी में पिछले तीन-चार दशकों से लगभग यही हो रहा है।
इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर छोडऩे का फतवा जारी कर दिया और उस पर अमल करवाने के लिए स्थान-स्थान पर उनकी निरीह हत्याएं भी करनी शुरु कर दी। अब इन कश्मीरी हिंदुओं के पास दो ही रास्ते बचे थे। या तो वे अपने परंपरागत पंथ को छोडक़र मुसलमान बन जाए या फिर कश्मीर घाटी छोड़ देें। कश्मीर के हिंदू और सिक्खों ने इस दूसरे रास्ते को ही चुना। दुर्भाग्य से कश्मीर घाटी में से हिंदुओं के इस सफाया ऑपरेशन में राज्य की सरकार ने भी अपनी लज्जाजनक हिस्सेदारी निभायी । वह उन्हें सुरक्षा देने में तो असफल सिद्ध हुई ही। साथ ही, उनके मकानों और सम्पत्ति पर मुसलमानों द्वारा बलपूर्वक कब्जा किए जाने पर सरकारी प्रशासन षडयंत्रपूर्ण ढंग से आंखे मूंदे रहा। इस सब का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर घाटी में इक्का- दुक्का हिंदू परिवारों को छोडक़र शेष सभी परिवार पलायन कर गए । इतिहास के सबसे भयानक इस पलायन पर न तो तथाकथिक मानवाधिकारवादी बोले और न ही केन्द्र सरकार केन्द्र सरकार के कानों पर जूं रेंगी। सोरहाबुद्दीन और इसरतजहां जैसे खूंखार आतंकवादियों की मौत पर दिन रात आंसू बहाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ और अरुंधति रॉय जैसी तथाकथित पराक्रमी जीवों के मुंह पर भी ताला लग गया। जिस प्रकार कभी भारतेन्दु हरिश्चंद ने लिखा था वैदिक हिंसा-हिंसा न भवति शायद उसी प्रकार ये मानवाधिकार वादी भी सोचते हैं कि कश्मीर हिंदुओं पर किया गया अत्याचार-अत्याचार नहीं होता और शायद उनके कोई मानवाधिकार हैं भी नहीं जिनकी रक्षा के लिए आवाज उठायी जाए । मनमोहन सिंह ने भी कभी कहा था कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का ही है। शायद, सरकार इसी सूत्र की व्याख्या करते हुए यह भी स्वीकार करती हो कि कश्मीरी हिंदुओं का कश्मीर में कोई अधिकार नहीं है। वहां अधिकार केवल इस्लामपंथियों का ही है। यही कारण है कि सरकार ने बिना चेहरे पर शिकन लाए अत्यंत गौरव से संसद को सूचित किया कि अभी तक आतंकवादियों द्वारा कश्मीर में केवल 107 हिंदू मंदिर तोडे गए हैं। यह अलग बात है कि तटस्थ पर्यवेक्षक इसकी संख्या कहीं ज्यादा बताते हैं।  कश्मीर घाटी से हिंदुओं के चले जाने से लगता था कि इस्लामी ताकतों ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है और कश्मीर अब निजामे-मुस्तफा बन गया है।
परन्तु लगता है यह सोच केवल धोखा थी। इस्लामी ताकतें जानती हंै कि जब तक ये कश्मीर हिंदू जीवित रहेंगे तब तक देश के विभिन्न हिस्सों में अपने अधिकारों के लिए हो- हल्ला करते रहेंगे। लोकतंत्र का युग हैं। हो हल्ले का कभी कभार असर भी हो सकता है। इसलिए, यदि कश्मीरी हिंदुओं को समाप्त ही कर दिया जाय या फिर किसी तरह उनकी युवा पीढ़ी को समाप्त कर दिया जाए तो यह समस्या सदा के लिए खत्म हो सकती है। फिर कश्मीर सचमुच इस्लामी राज्य बन सकता है। लेकिन प्रश्र है कि इन कश्मीर हिंदुओं को घेर-घारकर कैसे वापस लाया जाए ताकि इनका आसानी से शिकार हो सकें। जिन दिनों फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे वे कश्मीरी हिंदुओं को अनेक प्रकार के प्रलोभन देते रहे कि वापस कश्मीर घाटी में आ जाएं। लेकिन जब सुरक्षा की बात होती थी तो वे कन्नी काट लेते थे। एक बार तो उन्होंने व्यग्य से यह भी कहा था कि अब मैं हर कश्मीरी हिंदू के साथ पुलिस तो बैठा नहीं सकता। कश्मीरी हिंदू भी समझते थे कि फारुख अब्दुल्ला उन्हें घेरकर कश्मीर ले जाना चाहते हैं और उन आतंकवादियों के आगे फेंक देना चाहते हैं जो खुले तौर पर कश्मीरी हिंदुओं की हत्या की बात कर रहे हैं। इसलिए वे फारुख के इस प्रलोभन में नहीं फंसे।
लेकिन लगता है अब राज्य सरकार ने आतंकवादियों की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए ऑपरेशन नम्बर दो प्रारम्भ किया है। केन्द्र सरकार ने कश्मीरी हिंदुओं को दोबारा घाटी में बसाने के लिए एक विशेष पैकेज दिया था। इसके तहत राज्य में कश्मीरी विस्थापितों के लिए नौकरियों की घोषणा की थी। इन नौकरियों के लिए केवल कश्मीरी विस्थापित ही आवेदन दे सकते हैं। राज्य सरकार ने इस पैकेज की आड़ में ही कश्मीरी हिंदुओं की आड़ में ही ऑपरेशन नम्बर दो प्रारम्भ कर दिया है। 4 मई को कश्मीर सरकार के सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड ने कश्मीरी विस्थापियों के लिए आरक्षित इन नौकरियों के लिए प्रत्याशियों से आवेदन पत्र मांगे हंै। सरकार को आशा रही होगी कि नौकरियों के लालच में कश्मीरी हिंदुओं की युवा पीढ़ी बढ़चढ़ कर आवेदन पत्र देगी ही। लेकिन इसके आगे राज्य सरकार की षडय़ंत्रकारी भूूमिका प्रारंभ हो जाती है जो अप्रत्यक्ष रुप से इस्लामी आतंकियों के उद्देश्यों की पूर्ती के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। राज्य सरकार ने इस विज्ञापन में कश्मीरी विस्थापितों के लिए लगा दी है कि नौकरी में चुने जाने की स्थिति में उन्हें केवल कश्मीर घाटी में ही नौकरी करनी पड़ेगी वे किसी भी  हालात में कश्मीर घाटी से बाहर जाने के लिए स्थानांतरण कि मांग नहीं कर सकते। यदि चुना गया प्रत्याशी किसी भी समय और किसी भी कारण से कश्मीर घाटी छोड़ता है तो वह स्वत: ही नौकरी से बर्खास्त माना जाएगा और वह राज्य सरकार से फिर कभी भी कोई नौकरी नहीं मांग सकेगा।
5 मई की अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाईम्स ने इस बात का जिक्र अपनी एक खबर में प्रमुखता से किया है। व्यवहारिक रूप से राज्य सरकार की इस नीति का तात्पर्य क्या है?राज्य सरकार कश्मीरी हिंदू युवकों को घेरकर कश्मीर घाटी में ले आना चाहती है और उन्हें आतंकवादियों के सामने फेंक देना चाहती है। अभी तक इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में हिंदुओं के प्रति अपनी नीति में कोई परिवर्तन किया है। आश्चर्य होता है कि उमर अब्दुल्ला की सरकार अप्रत्यक्ष रुप से इस क्षेत्र में आतंकवादियों की सहायता के लिए इतनी आतुर क्यों है? जम्मू कश्मीर राज्य में तीन खंड है। जम्मू संभाग लद्दाख संभाग और कश्मीर संभाग । सरकारी कमचारियों के स्थानांतरण आम तौर पर सारे राज्य में होते रहते हैं। परंतु इस विज्ञापन के अंतर्गत सरकारी पदों पर नियुक्त हुए इन कश्मीरी हिंदू युवकों के लिए राज्य सरकार यह अधिकार देने के लिए भी तैयार नहीं है। न ये युवक स्थानांतरित होकर जम्मू जा सकेंगे और न ही लद्दाख। मान लीजिए आंतकवादी  इन युवकों को मारते हंै और वे जान बचाने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ देते हैं तो उमर अब्दुल्ला की सरकार उन्हें फिर कभी भविष्य में सरकारी नौकरी में नहीं रखेगी। सरकार की कश्मीरी हिंदू युवकों के लिए नीति स्पष्ट हो गयी लगती है। हम कश्मीर घाटी में तुम्हारी रक्षा तो नहीं कर सकते। तुम्हारे लिए वहां आतंकवादियों के हाथों मरने का विकल्प खुला है परन्तु हम तुम्हें किसी भी हालत में कश्मीर हिंदुओं के सफाए का ऑपरेशन नम्बर 2 शुरु कर दिया है और उसे पूरा करने के लिए घृणित षडय़ंत्र रचे जा रहे हैं। उमर अब्दुल्ला की सरकार की अभी तक उपलब्धियों में शायद यही सबसे अच्छी उपलब्धि मानी जाएगी क्योंकि इस उपलब्धि पर आतंकवादी भी घाटी में लड्डू बांट रहे हैं। 
-लेखक, हिमाचल विश्वविद्यालय में निदेशक, दर्जनों पुस्तकों के लेखक तथा नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार के संपादक हंै।
(नवोत्थान लेखसेवा, हिन्दुस्थान समाचार)

Celebrated Kashmir writer Basharat Peer has escalated the debate over the canceled Kashmir literary festival with this piece Wednesday in The Hindu .The festival’s organizers canned the festival last month after Mr. Peer and other writers, journalists and academics wrote an open letter opposing it.
Mr. Peer in his piece in The Hindu elaborated on his reasons for taking such a stance against the festival.
In a way, Mr. Peer’s objections show the intractable nature of the Kashmir problem.
In their open letter, those opposing the festival said it would have helped New Delhi create a fake sense of normalcy in Kashmir, where Indian troops continue to commit human rights abuses and free speech for separatists is curtailed. The signatories said they were worried the government was behind the festival but gave no evidence.
The festival organizers, Mr. Peer expounds in The Hindu, planned to use a private school owned by Vijay Dhar as a venue for the event. The problem with Mr. Dhar, in Mr. Peer’s mind, was that he was an adviser to Indian Prime Minister Rajiv Gandhi in the 1980s and has allowed the school in the past to be used for an army-sponsored cricket tournament.
Furthermore, Mr. Peer writes that the festival organizers used Jyotsna Singh as an adviser. She is the granddaughter of the pre-1947 ruler of Kashmir, Hari Singh. Ms. Singh’s involvement was unacceptable, Mr. Peer claims, because her inherited wealth comes in part from the forced labor of landless Kashmiri peasants, including Mr. Peer’s ancestors, on her family’s land.
With due respect to Mr. Peer, this would appear to fall pretty far short of unsubstantiated claims made in the open letter that the signatories were concerned the festival was being undermined by “state interference and design. ”
To date there is nothing public to suggest the government in New Delhi was using the festival to promote a view that Kashmir has returned to normal.
The festival organizer and author, Namita Gokhale, who is not a Kashmiri, says the government has played no part. “The Indian government had nothing to do with it,” she said. “There can’t be any overriding conspiracy theories.”
The brouhah has shone a light on an ongoing debate within Kashmiri society about how to deal with India’s track record of human rights abuses in the territory and continued militarization of the Kashmir Valley which led to the deaths of over 100 stone-throwing protesters last year.
Naseem Shafai, a Kashmiri-language poet who also was involved in organizing the festival, says people in the valley have suffered but a literary festival would have been a way of expressing frustrations and showcasing their work, which often deals with the brutalization of Kashmir society.
Mr. Peer disagrees. In the open letter, the signatories said it was impossible to have a literary festival in Kashmir because the Indian state uses draconian laws to curtail free-speech in the territory. But they also said they would have supported such a festival if they were convinced the state was not behind the event. They accused the government of using the event to “give legitimacy to a brutal, repressive regime.”
Well, Mr. Peer’s piece in The Hindu does little to add weight to the view the state was a puppeteer managing the festival, which was supported by a number of Kashmir writers who live in the Valley. (Mr. Peer has lived recently in New York and New Delhi.)
Mr. Peer himself attended the Jaipur literary festival a number of times, even before his book, “Curfewed Night“, a memoir of growing up during the Kashmiri insurgency in the 1990s, became such an international hit and was named by The New Yorker magazine as a critics’ pick for 2010.
The organizer of the Jaipur festival? Ms. Gokhale, who hopes she’ll be able to stage the Kashmir festival next year .