Monday, 3 October 2011

“नेताजी से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करे सरकार


सूचना के अधिकार के तहत नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग ने पिछले एक सप्ताह में भारत सरकार को दूसरा बड़ा झटका दिया है। पिछले सप्ताह 26 मार्च, 2007 को इस मामले में मिशन नेताजी के शयन्तन दासगुप्ता की अपील पर सुनवाई के दौरान केन्द्रीय सूचना आयोग के सूचना आयुक्त ए.एन. तिवारी ने कहा कि “नेताजी से जुड़े दस्तावेजों पर से गोपनीयता का परदा हटाना होगा।” उन्होंने कहा कि “भारतीयों को अपने राष्ट्रनायक के बारे में सभी सूचना हासिल करने का पूरा अधिकार है।” उन्होंने घोषणा की कि इस मामले में अगली सुनवाई केन्द्रीय सूचना आयोग की पूर्ण पीठ करेगी और गृह मंत्रालय के पास इस मामले में आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखने का यह अंतिम अवसर होगा और मंत्रालय को इस बारे में पर्याप्त स्पष्टीकरण देना होगा कि उन दस्तावेजों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि “यदि सरकार का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं हुआ तो आयोग सभी संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने का आदेश देने के लिए बाध्य होगा।”
मामले पर सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय के अधिकारी आयोग द्वारा निर्दिष्ट आवश्यक दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के बजाय गृह सचिव द्वारा लिखित एक गोपनीय नोट लेकर आए, जिसमें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क) का राग अलापा गया था। इस नोट को देखकर सूचना आयुक्त ए.एन. तिवारी भड़क गए और उन्होंने टिप्पणी की:
The issue is far too important to be decided in an ad hoc manner at the level of a Home Secretary. I am not prepared to allow an omnibus recourse to section 8 (1) (a)….
(यह मामला इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि इस पर गृह सचिव के स्तर पर तदर्थ तरीके से निर्णय नहीं लिया जा सकता। मैं धारा 8(1)(क) का हर जगह सहारा लिए जाने की अनुमति देने के लिए तैयार नहीं हूं….)
गौरतलब है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में लापता हो जाने की जाँच के लिए मुखर्जी आयोग से पहले भारत सरकार द्वारा गठित दो अन्य जाँच पैनलों ने जिन गोपनीय एवं महत्वपूर्ण दस्तावेजों का अवलोकन किया था, सरकार उन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से अब तक इनकार करती रही है। पिछले वर्ष मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज किए जाने पर संसद में विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बाद गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने स्पष्टीकरण दिया था कि इस मामले में (कांग्रेस सांसद) शाह नवाज खान द्वारा 1956 में पेश जाँच रिपोर्ट और (इंदिरा गांधी के जीवनी लेखक) जी.डी. खोसला द्वारा 1970-74 के दौरान की गई जाँच की रिपोर्ट को सरकार (उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश) जस्टिस मनोज मुखर्जी की जाँच रिपोर्ट से अधिक विश्वसनीय मानती है। यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर भारत की जनता यह जरूर जानना चाहेगी कि आखिर वे कौन-से दस्तावेज थे जिनका पूर्ववर्ती जाँच पैनलों ने अध्ययन तो किया था लेकिन जिनको अपनी रिपोर्टों के साथ संलग्न करना जरूरी नहीं समझा। यदि वे दस्तावेज हमारे सामने मौजूद हों तभी सरकार के इस दावे की पुष्टि हो सकेगी कि पूर्ववर्ती जाँच रिपोर्ट अधिक विश्वसनीय हैं। अन्यथा यह निष्कर्ष निकालना निराधार नहीं होगा कि पूर्ववर्ती जाँच आयोग वास्तव में सरकार द्वारा पहले से निर्दिष्ट निष्कर्ष पर पहुँचने और जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए गठित किए गए थे।
यह भी गौरतलब है कि मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट के साथ प्राय: वे सभी दस्तावेज संलग्न किए गए हैं जिनका उसने जाँच के क्रम में अध्ययन किया था। यहाँ तक कि जस्टिस मुखर्जी ने ऐसे दस्तावेज भी लंदन स्थित ब्रिटिश अभिलेखागार से ढूंढ़ निकाले, जिन्हें भारत सरकार 1956 से छिपा रही थी और जिनके आधार पर पहली जाँच के समय ही यह पुष्टि हो सकती थी कि नेताजी की मृत्यु कथित विमान दुर्घटना में 1945 में नहीं हुई थी।
इसलिए पूर्ववर्ती जाँच पैनलों द्वारा जिन दस्तावेजों का अध्ययन किया था, उनकी प्रतिलिपियाँ उपलब्ध कराने के लिए मिशन नेताजी के शयन्तन दासगुप्ता ने पिछले वर्ष सूचना के अधिकार के तहत गृह मंत्रालय में आवेदन किया था। मंत्रालय द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(क) के उपबंध का हवाला देते हुए दस्तावेजों की प्रतिलिपि उपलब्ध कराने से इन्कार कर दिए जाने के बाद केन्द्रीय सूचना आयोग में अपील दायर की गई। अक्तूबर, 2006 में आयोग द्वारा इस मामले में पहली सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने उन दस्तावेजों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की थी। उसके बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश पर अपीलकर्ता ने अपने संशोधित आवेदन के साथ ऐसे202 गोपनीय दस्तावेजों की सूची संलग्न कर दी जिनका खोसला आयोग ने जाँच के क्रम में उपयोग किया था। सूचना आयोग ने गृह मंत्रालय को इस मामले पर अगली सुनवाई के दौरान उक्त सभी दस्तावेजों को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। इस लेख श्रृंखला के एक पिछले लेख में मैंने यह आशा व्यक्त की थी कि शायद सरकार केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश का पालन करेगी।
सूचना आयोग के इस सख्त आदेश के बाद आशान्वित इस मामले के अपीलकर्ता शयन्तन दासगुप्ता ने कहा:
जस्टिस मुखर्जी की जाँच रिपोर्ट के निष्कर्ष कि नेताजी की मृत्यु कथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी और उसके बाद सरकार द्वारा उस निष्कर्ष को तर्कहीन ढंग से खारिज कर दिए के बाद हम भारतीयों के लिए उन सभी दस्तावेजों की छानबीन करना जरूरी हो गया है ताकि हम खुद सही निष्कर्ष तक पहुंच सकें। तभी यह साफ हो सकेगा कि भारत की जनता से तथ्यों को छिपाए जाने के पीछे क्या इरादे रहे हैं।
सूचना के अधिकार के तहत नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग का यह आदेश पिछले एक सप्ताह में भारत सरकार के लिए दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले आयोग ने विदेश मंत्रालय को भी 23 मार्च, 2007 को ऐसे ही सख्त आदेश दिए थे। इस मामले में सरकार के शीर्ष नौकरशाह सूचना के अधिकार संबंधी क़ानून के शिकंजे में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं। देखना है कि इस मामले में राजनीतिक नेतृत्व के अवांछित दबाव से मुक्त हो पाने की हिम्मत वे कब जुटा पाते हैं।

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