पहले दिल्ली हाईकोर्ट और फिर सप्ताह बीतते ही आगरा के एक निजी अस्पताल में विस्फोट.. चीख-पुकार, अफरा-तफरी, लाशें, सांत्वना और कुछ घिसी-पिटी घोषणाएं। दिल्ली हाईकोर्ट में इसके पहले इसी साल मई में भी विस्फोट हुआ था। बाद में यानी 7 सितंबर को हुए विस्फोट के बारे में भी अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे आम जनता में यह भरोसा बने कि वह सुरक्षित है और आगे ऐसा कुछ नहीं होगा। अब तक जो हुआ है, वह है सिर्फ बयानबाजी। वह भी घिसी-पिटी.. कुछ नया नहीं। अरसे से दिए जा रहे बयान एक बार फिर दोहरा दिए गए। क्या इसी के दम पर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था चलेगी? जनता इन थोथे बयानों, जुबानी चिंताओं और झूठे आश्वासनों के भरोसे कितने दिन जिंदा रह लेगी? एसपीजी और जेड श्रेणी के सुरक्षा घेरों में चलने वाले लोग इसका अंदाजा नहीं लगा सकते। रोजी-रोटी की अपनी मजबूरियों के चलते रोज दुकान-दफ्तर आते-जाते लोगों को देखकर यह जुमला चलाया जा सकता है कि जिंदगी फिर पटरी पर आ गई, लेकिन जिंदगी कितनी पटरी पर होती है और कितनी पटरी से नीचे यह आम लोगों और उनके परिजनों से पूछ कर देखें तो पता चले।
आए दिन होते विस्फोटों का नतीजा यह हुआ है कि देश भर में कहीं भी लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। घर से बाहर निकलने की हिम्मत तो आम आदमी को नहीं ही होती है, घर के भीतर भी वह डरा-सहमा हुआ ही रह रहा है। जहां तक बाहर निकलने और अपने कामकाज में लगे होने की बात है, उसका एक ही कारण है और वह यह कि घर में बैठे रह कर कोई पेट नहीं भर सकता है। जीवन चलाना है तो बाहर निकलना ही होगा। यह समझना कठिन है कि हम कैसी व्यवस्था में जी रहे हैं। आखिर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? आतंकवादी देश में घुसने और पनपने न पाएं तथा वे अपने खतरनाक इरादों को अंजाम न देने पाएं, यह सुनिश्चित करना किसका काम है? गुंडे-बदमाश और माफिया देश में अपनी मनमानी न चलाने पाएं, यह तय करना किसकी जिम्मेदारी है? क्या इसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं? अगर यह काम आम जनता को ही करना है तो फिर सरकार की जरूरत क्या है? क्यों हम शासन-प्रशासन के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों रुपये रोज खर्च कर रहे हैं? ऐसी नीतियां किस काम की हैं जो जनता को शांतिपूर्ण और सुरक्षित जीवन की गारंटी भी नहीं दे सकती हैं?
ये सवाल हमारे नहीं, आम जनता के हैं। बाजार, धर्मस्थल, ट्रेन-बस .. कहीं भी, जहां दस लोग जुटे हों और कोई चर्चा चल पड़े, तो इन दिनों यही सवाल उछलते नजर आ रहे हैं। लोग इसके लिए साफतौर पर सरकार की ढुलमुल नीतियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। पिछले तीन दशकों पर नजर डालें तो अब तक की हमारी सभी सरकारें आतंकवादियों और उन्हें मदद देने वाले देशों के प्रति किसी भी तरह की सख्ती बरतने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार सख्ती बरतना नहीं जानती है। उसे सख्ती बरतना बहुत अच्छी तरह आता है, लेकिन सिर्फ निहत्थे, निर्दोष और कमजोर लोगों पर। जिनके साथ अत्यंत कड़ा बर्ताव किया जाना चाहिए, उनके साथ हमारी सरकार जरा भी कड़ाई नहीं बरत पाती है। उनके लिए मानवाधिकार के सवाल उठा दिए जाते हैं और उन तमाम निर्दोषों का मानवाधिकार जाने क्यों मुल्तवी कर कर दिया जाता है, जिनका जीवन वे पहले ही बेवजह छीन चुके होते हैं। हमारे यहां शासन तंत्र के लिजलिजेपन का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा?
बुनियादी सवाल तो यह है कि हमारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो भी तो कैसे? न तो देश में मौजूद संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर नजर रखने की कोई पुख्ता व्यवस्था है और न ही दूसरे देशों से आए लोगों की समय से वापसी सुनिश्चित करने की। कोई यहां आकर कितने भी दिन तक बने रह सकता है। जिन देशों के लोगों के रंग-रूप हमसे नहीं मिलते उनके भी ठहरने की समय सीमा सुनिश्चित करने का कोई प्रभावी उपाय हमारे यहां उपयोग में नहीं लाया जाता। वे खुद समय से चले जाते हैं और कोई बेजा हरकत नहीं करते, तो यह उनकी शराफत है। हमें सबसे अधिक खतरा उन्हीं देशों के लोगों से है, जिनके नागरिकों के रंग-रूप बिलकुल हमारे ही जैसे हैं। भला उन पर हम कैसे रोक लगाएंगे। न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बावजूद अवैध रूप से यहां रह रहे बांग्लादेशियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की कोई निश्चित व्यवस्था आज तक नहीं बनाई जा सकी है। भारत के अधिकतर छोटे-बड़े शहरों में वे मौजूद हैं और कई तरह से हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा भी बने हुए हैं।
क्या यह सिर्फ पुलिस और प्रशासन की खामी है? आम जनता अब इसे पुलिस या प्रशासन की लापरवाही या नाकामी मानने के लिए कतई तैयार नहीं है। आम देशवासी यह मानता है कि राजनेता बांग्लादेशियों को वोट बैंक के रूप में देखते हैं। वे किसी भी तरह अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए इन्हें बचाते हैं। वे चाहते ही नहीं कि इन्हें वापस भेजा जाए, क्योंकि इनसे उन्हें थोक में वोट मिल जाते हैं, सिर्फ इस शर्त पर कि उन्हें यहां किसी तरह रहने दिया जाए। ठीक यही बात पाकिस्तान से आकर अवैध रूप से यहां रह रहे लोगों के मामले में भी है। लोगों के ऐसा मानने के पीछे पर्याप्त वजहें हैं। हर शख्स यह देख रहा है कि वास्तविक भारतीय नागरिकों की किसी समस्या के समाधान में राजनेताओं की कोई रुचि नहीं रह गई है। महंगाई, बेकारी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए उन्हें जादू की छड़ी चाहिए, जो उनके पास नहीं है। आतंकवाद के दोषियों को वे छोड़ेंगे नहीं, लेकिन पकड़ने में कोई रुचि भी नहीं लेंगे। आखिर मतलब क्या रह गया है सरकार के होने का?
सच तो यह है कि आतंकवाद समेत सभी समस्याओं पर काबू पाने के लिए सिर्फ दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है और हम इस मामले में भयावह अभाव के दौर से गुजर रहे हैं। हम देशों तो क्या, आतंकवादियों के सामने घुटने टेक देते हैं। सभी तरह के साधन और सुविधाएं तथा योग्य एवं सक्षम तंत्र के होते हुए भी आतंकवाद के खिलाफ एक समग्र अभियान चला पाने में इंदिरा गांधी के बाद हमारी सरकारें विफल रही हैं। हमें मालूम है कि हमारे यहां आतंकवाद का अधिकांश पाकिस्तान से प्रायोजित है, इसके बावजूद हमारे राजनेताओं ने न तो उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गोलबंदी में कोई खास दिलचस्पी दिखाई और न उसे कोई संदेश ही दिया। पिछले करीब बीस वषरें से हम उसके साथ बातचीत के नाटक में अपनी भूमिका निभा रहे हैं और नतीजा शून्य है। इससे कुछ होने वाला नहीं है। कुछ हो, इसके लिए अनिवार्य है कि वास्तव में सख्ती बरती जाए। आतंक का खेल खेलने वालों को जब तक मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया जाएगा, मौत का यह तांडव रोक पाना संभव नहीं है।
[निशिकान्त ठाकुर: लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं]
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