Thursday, 8 September 2011


पहले कुछ सौ सालों से मतांतरण के कारण कश्मीरी हिंदुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है। अनेकानेक कारणों से अधिकांश कश्मीरी हिंदू इस्लाम मजहब में दीक्षित हो गए। लेकिन फिर भी कश्मीर घाटी में लगभग 4 लाख हिंदू बचे रहे जिन्होंने तमाम प्रलोभनों को ठुकराते हुए और शासकीय अत्याचारों को सहते हुए भी अपने पंथ अथवा मजहब का त्याग नहीं किया। ये कश्मीरी हिंदू इस्लामी कट्टरवारी ताकतों की किरकिरी बने हुए थे क्योंकि इस्लामी शासन तभी तक सहिष्णु है जब तक राज्य में इस्लाम पंथी अल्पमत में हैं। लेकिन जैसे ही किसी क्षेत्र में इस्लाम पंथी निर्णायक बहुमत में आ जाते हैं वहां वे अन्य मतावलंबियों को या तो दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखते हैं या फिर उन्हें इस्लाम में दीक्षित करने का प्रयास करते हैं। इन दोनों प्रयासों में यदि वे असफल हो जाते हैं। तो वे उनको डराकर वहां से भगाने का प्रयास करते हैं। कश्मीर घाटी में पिछले तीन-चार दशकों से लगभग यही हो रहा है।
इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर छोडऩे का फतवा जारी कर दिया और उस पर अमल करवाने के लिए स्थान-स्थान पर उनकी निरीह हत्याएं भी करनी शुरु कर दी। अब इन कश्मीरी हिंदुओं के पास दो ही रास्ते बचे थे। या तो वे अपने परंपरागत पंथ को छोडक़र मुसलमान बन जाए या फिर कश्मीर घाटी छोड़ देें। कश्मीर के हिंदू और सिक्खों ने इस दूसरे रास्ते को ही चुना। दुर्भाग्य से कश्मीर घाटी में से हिंदुओं के इस सफाया ऑपरेशन में राज्य की सरकार ने भी अपनी लज्जाजनक हिस्सेदारी निभायी । वह उन्हें सुरक्षा देने में तो असफल सिद्ध हुई ही। साथ ही, उनके मकानों और सम्पत्ति पर मुसलमानों द्वारा बलपूर्वक कब्जा किए जाने पर सरकारी प्रशासन षडयंत्रपूर्ण ढंग से आंखे मूंदे रहा। इस सब का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर घाटी में इक्का- दुक्का हिंदू परिवारों को छोडक़र शेष सभी परिवार पलायन कर गए । इतिहास के सबसे भयानक इस पलायन पर न तो तथाकथिक मानवाधिकारवादी बोले और न ही केन्द्र सरकार केन्द्र सरकार के कानों पर जूं रेंगी। सोरहाबुद्दीन और इसरतजहां जैसे खूंखार आतंकवादियों की मौत पर दिन रात आंसू बहाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ और अरुंधति रॉय जैसी तथाकथित पराक्रमी जीवों के मुंह पर भी ताला लग गया। जिस प्रकार कभी भारतेन्दु हरिश्चंद ने लिखा था वैदिक हिंसा-हिंसा न भवति शायद उसी प्रकार ये मानवाधिकार वादी भी सोचते हैं कि कश्मीर हिंदुओं पर किया गया अत्याचार-अत्याचार नहीं होता और शायद उनके कोई मानवाधिकार हैं भी नहीं जिनकी रक्षा के लिए आवाज उठायी जाए । मनमोहन सिंह ने भी कभी कहा था कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का ही है। शायद, सरकार इसी सूत्र की व्याख्या करते हुए यह भी स्वीकार करती हो कि कश्मीरी हिंदुओं का कश्मीर में कोई अधिकार नहीं है। वहां अधिकार केवल इस्लामपंथियों का ही है। यही कारण है कि सरकार ने बिना चेहरे पर शिकन लाए अत्यंत गौरव से संसद को सूचित किया कि अभी तक आतंकवादियों द्वारा कश्मीर में केवल 107 हिंदू मंदिर तोडे गए हैं। यह अलग बात है कि तटस्थ पर्यवेक्षक इसकी संख्या कहीं ज्यादा बताते हैं।  कश्मीर घाटी से हिंदुओं के चले जाने से लगता था कि इस्लामी ताकतों ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है और कश्मीर अब निजामे-मुस्तफा बन गया है।
परन्तु लगता है यह सोच केवल धोखा थी। इस्लामी ताकतें जानती हंै कि जब तक ये कश्मीर हिंदू जीवित रहेंगे तब तक देश के विभिन्न हिस्सों में अपने अधिकारों के लिए हो- हल्ला करते रहेंगे। लोकतंत्र का युग हैं। हो हल्ले का कभी कभार असर भी हो सकता है। इसलिए, यदि कश्मीरी हिंदुओं को समाप्त ही कर दिया जाय या फिर किसी तरह उनकी युवा पीढ़ी को समाप्त कर दिया जाए तो यह समस्या सदा के लिए खत्म हो सकती है। फिर कश्मीर सचमुच इस्लामी राज्य बन सकता है। लेकिन प्रश्र है कि इन कश्मीर हिंदुओं को घेर-घारकर कैसे वापस लाया जाए ताकि इनका आसानी से शिकार हो सकें। जिन दिनों फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे वे कश्मीरी हिंदुओं को अनेक प्रकार के प्रलोभन देते रहे कि वापस कश्मीर घाटी में आ जाएं। लेकिन जब सुरक्षा की बात होती थी तो वे कन्नी काट लेते थे। एक बार तो उन्होंने व्यग्य से यह भी कहा था कि अब मैं हर कश्मीरी हिंदू के साथ पुलिस तो बैठा नहीं सकता। कश्मीरी हिंदू भी समझते थे कि फारुख अब्दुल्ला उन्हें घेरकर कश्मीर ले जाना चाहते हैं और उन आतंकवादियों के आगे फेंक देना चाहते हैं जो खुले तौर पर कश्मीरी हिंदुओं की हत्या की बात कर रहे हैं। इसलिए वे फारुख के इस प्रलोभन में नहीं फंसे।
लेकिन लगता है अब राज्य सरकार ने आतंकवादियों की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए ऑपरेशन नम्बर दो प्रारम्भ किया है। केन्द्र सरकार ने कश्मीरी हिंदुओं को दोबारा घाटी में बसाने के लिए एक विशेष पैकेज दिया था। इसके तहत राज्य में कश्मीरी विस्थापितों के लिए नौकरियों की घोषणा की थी। इन नौकरियों के लिए केवल कश्मीरी विस्थापित ही आवेदन दे सकते हैं। राज्य सरकार ने इस पैकेज की आड़ में ही कश्मीरी हिंदुओं की आड़ में ही ऑपरेशन नम्बर दो प्रारम्भ कर दिया है। 4 मई को कश्मीर सरकार के सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड ने कश्मीरी विस्थापियों के लिए आरक्षित इन नौकरियों के लिए प्रत्याशियों से आवेदन पत्र मांगे हंै। सरकार को आशा रही होगी कि नौकरियों के लालच में कश्मीरी हिंदुओं की युवा पीढ़ी बढ़चढ़ कर आवेदन पत्र देगी ही। लेकिन इसके आगे राज्य सरकार की षडय़ंत्रकारी भूूमिका प्रारंभ हो जाती है जो अप्रत्यक्ष रुप से इस्लामी आतंकियों के उद्देश्यों की पूर्ती के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। राज्य सरकार ने इस विज्ञापन में कश्मीरी विस्थापितों के लिए लगा दी है कि नौकरी में चुने जाने की स्थिति में उन्हें केवल कश्मीर घाटी में ही नौकरी करनी पड़ेगी वे किसी भी  हालात में कश्मीर घाटी से बाहर जाने के लिए स्थानांतरण कि मांग नहीं कर सकते। यदि चुना गया प्रत्याशी किसी भी समय और किसी भी कारण से कश्मीर घाटी छोड़ता है तो वह स्वत: ही नौकरी से बर्खास्त माना जाएगा और वह राज्य सरकार से फिर कभी भी कोई नौकरी नहीं मांग सकेगा।
5 मई की अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाईम्स ने इस बात का जिक्र अपनी एक खबर में प्रमुखता से किया है। व्यवहारिक रूप से राज्य सरकार की इस नीति का तात्पर्य क्या है?राज्य सरकार कश्मीरी हिंदू युवकों को घेरकर कश्मीर घाटी में ले आना चाहती है और उन्हें आतंकवादियों के सामने फेंक देना चाहती है। अभी तक इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में हिंदुओं के प्रति अपनी नीति में कोई परिवर्तन किया है। आश्चर्य होता है कि उमर अब्दुल्ला की सरकार अप्रत्यक्ष रुप से इस क्षेत्र में आतंकवादियों की सहायता के लिए इतनी आतुर क्यों है? जम्मू कश्मीर राज्य में तीन खंड है। जम्मू संभाग लद्दाख संभाग और कश्मीर संभाग । सरकारी कमचारियों के स्थानांतरण आम तौर पर सारे राज्य में होते रहते हैं। परंतु इस विज्ञापन के अंतर्गत सरकारी पदों पर नियुक्त हुए इन कश्मीरी हिंदू युवकों के लिए राज्य सरकार यह अधिकार देने के लिए भी तैयार नहीं है। न ये युवक स्थानांतरित होकर जम्मू जा सकेंगे और न ही लद्दाख। मान लीजिए आंतकवादी  इन युवकों को मारते हंै और वे जान बचाने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ देते हैं तो उमर अब्दुल्ला की सरकार उन्हें फिर कभी भविष्य में सरकारी नौकरी में नहीं रखेगी। सरकार की कश्मीरी हिंदू युवकों के लिए नीति स्पष्ट हो गयी लगती है। हम कश्मीर घाटी में तुम्हारी रक्षा तो नहीं कर सकते। तुम्हारे लिए वहां आतंकवादियों के हाथों मरने का विकल्प खुला है परन्तु हम तुम्हें किसी भी हालत में कश्मीर हिंदुओं के सफाए का ऑपरेशन नम्बर 2 शुरु कर दिया है और उसे पूरा करने के लिए घृणित षडय़ंत्र रचे जा रहे हैं। उमर अब्दुल्ला की सरकार की अभी तक उपलब्धियों में शायद यही सबसे अच्छी उपलब्धि मानी जाएगी क्योंकि इस उपलब्धि पर आतंकवादी भी घाटी में लड्डू बांट रहे हैं। 
-लेखक, हिमाचल विश्वविद्यालय में निदेशक, दर्जनों पुस्तकों के लेखक तथा नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार के संपादक हंै।
(नवोत्थान लेखसेवा, हिन्दुस्थान समाचार)

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