कोरी कल्पना का समावेश कर समाचार गढने की प्रवृति धर्म के लिए घातक-धरानन्द ब्रह्मचारी
अनिल बिष्ट
हरिद्वार। श्री शंकराचार्य आश्रम हरिद्वार के प्रभारी एवं सार्वभौम गंगा सेवा अभियान उत्तराखण्ड के गंगा सेवा पाल ब्रह्मचारी श्री धरानन्द जी ने ऐतिहासिक तथ्यों के अन्वेषण के बजाये उनमें कोरी कल्पना का समावेश कर समाचार गढने की प्रवृति को परम्परा और धर्म के लिये घातक बताते हुए स्थानीय समाचार पत्र में चौसर के कारण खाली रही ज्योतिष पीठ शीर्षक से प्रकाशित समाचार को भ्रामक, तथ्य विहिन व निन्दनीय बताते हुए इसका खण्डन किया गया है।
ज्ञातव्य है कि उक्त समाचार पत्र ने किसी गोपनीय माध्यम के हवाले से यह कहने का प्रयास किया है। कि ज्योतिषपीठ‘ है की गद्दी १६४ वर्षो तक इसलिये खाली रही क्योंकि १८७६ ई० में उस पर विराजे शकर्राचार्य जी चौसर खेल के प्रेमी थे और उन्होंने ज्योतिष्पीठ की गद्दी को बाजी पर लगा दिया था। खेल में पराजित हो जाने के बाद उन्हें रावल को ज्योतिष्पीठ और बद्रीनाथश् मन्दिर सौंपकर गुजरात के लिये पलायन करना पडा था।
ब्रह्मचारी जी ने आगे बताया कि ज्योतिष्पीठ के १६५ वर्षो तक खाली रहने का कारण तत्कालीन भौगोलिक परिस्थितियों और नेपाल का भारत पर आक्रमण था। रावल शकराचार्य जी का ही ब्रह्मचारी था। इस इतिहास को गढवाल के प्रामाणित इतिहास में भी देखा जा सकता है। जब बद्रीनाथ मन्दिर कापट बन्द होता है। और उनका श्रीविग्रह जोशीमठ आता है। तब उनके साथ ही शंकराचार्य जी की गद्दी पालकी में आती है और जोशीमठ के नरसिंह मन्दिर प्रांगण में यथास्थान विराजित होती है। रावल गद्दी को प्राणाम करता है और अपने नियत अलग आसन पर बैठता है।
श्री ब्रह्मचारी जी ने स्पष्ट किया है कि ज्योतिष्पीठ पर वर्तमान में पूज्यवाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा शारदापीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज विधिवत् अभिषेक होकर सन् १९७३ से ही विराजमान है और निरन्तर धर्म प्रचार का कार्य कर रहे है।
जहंा तक स्वामी वासुदेवानन्द जी के जूना अखाडे की पेशवाई में सम्मिलित होने का प्रश्न है वह स्वयं बताता है कि वे ज्योतिष्पीठ के शकंराचार्य नहीं है। यदि वे ज्योतिष्पीठ के शकराचार्य होते तो किसी अखाडे के साथ पेशवाई करने के स्थान पर स्वयं उनका पेशवाई जुलूस होता जिसका स्वागत अखाडे करते। जूना अखाडा अपने आचार्य महामण्डलेश्वर को सबसे पूजनीय मानता है। और स्वामी वासुदेवानन्द जी को उनके पीछे चलाता है। यदि स्वामी वासुदेवानन्द जी शंकराचार्य है तो जूना अखाडे के आचार्य महामण्डलेश्वर के पीछे चलकर वे स्वयं कौन सी महिमा गरिमा पा रहे है। यही प्रश्न है।

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